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कातिल बरसात

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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सूरज डूबा फिर शाम ढली,अंधेरा छाया और हो गई थी रात,
रोजमर्रा के माफिक खाना खा कर, सो गए सारे थे उस रात।

घना अंधेरा था,कोहरा घनेरा था,घने थे बदल और बरसात,
सुबह आई थी खबर कि आठ को,लील गई कातिल बरसात।

माँ से लिपटे बच्चे मिले थे,मलबे में दबे पड़े थे सब माँ-बाप,
चार थे बच्चे;तीन बड़े थे,मेहमान ससुर भी दब गए थे साथ।

वह नव प्रधान था काशन का, थी पंचायत भी नव सौगात,
बूढ़े माँ-बाप,भाई घर में न थे,खा गई कुल कातिल बरसात।

उल्टी गंगा बहती यह होती है, माँ-बाप हुए हैं आज अनाथ,
छाती पीट रोते हैं बेचारे,देख आठअर्थियां उठाती एकसाथ।

दरक उठी थी पहाड़ी ही सारी,नींद में लेटे थे सारे अर्ध रात,
ढह गया था घर ही सारा तो,करता ही कौन बचाने की बात ?

दबे पाँव मौत ही थी आई,कर गई बरसात में हाथ थी साफ,
जिन्दा बचा एक बेटा था घर का,बस दो बचे बूढ़े माँ-बाप।

वह भयानक मंजर जिसने भी देखा,रह गया था वह बेबाक,
चेहरों पर थे आँसू ही आँसू,भूल न पाएंगे वह कातिल रात॥