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कितना अच्छा होता…

असित वरण दास
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)
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विश्व सौहार्द दिवस स्पर्धा विशेष….

कितना अच्छा होता…
प्रकाश और अंधकार की तरह,
एक-दूजे को जाने बिना
एक-दूजे के पास-पास होना।

हर मौसम के हैं अलग रंग,
हर बादल का है अलग मन..
अच्छा होता कितना,
बारिश के रंगों का
वसंत के रंगों में घुलते जाना,
और हेमंत का रंग
यूँ ही अनायास पा जाना।

जब हम मौन होते हैं
एक-दूजे के क़रीब होते हैं
ढूंढते हैं शब्द जब,
अपनेपन या प्रेम के लिए
अपने ही मन के अनुरुप,
खो देते हैं तब प्रेम की खुशबू
और रिश्ते की प्यारी-सी धूप।

समंदर में उभरे एक टापू की तरह,
कितना अच्छा होता
एक-दूजे को तरंगों से छू कर,
मौन आँखों से टटोलकर
धड़कनों की खुशबू लेना,
और एक-दूजे को यूँ ही
निःशब्द पा जाना।

अच्छा होता कितना…
जीवन और मृत्यु के संगम पर,
धूप और परछाई की तरह
एक-दूजे को यूँ ही,
आत्मसात करना।
एक-दूजे को यूँ ही,
निःशब्द पा जाना॥

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