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खुशियों के बीज

कार्तिकेय त्रिपाठी ‘राम’
इन्दौर मध्यप्रदेश)
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विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष……………


हरी-भरी वसुन्धरा को,
देख कर मेरा वतन
मुस्कुरा रहा है ऐसे,
फूल का कोई चमन।

हर जवान देखता है,
सीना तानकर यहां
आजाद,भगत,बोस ने,
जन्म लिया हो जहां।

जमीं है मेरे प्यार की,
जमीं मेरे दुलार की
महक ये बिखेरती,
प्रेम,पावन,प्यार की।

ये धरा भी देखो हमको,
कैसे यूँ लुभा रही
छा रही अमराई है,
गंगा,सुधा बरसा रही।

इसका थोडा़ गुणगान करें,
और इसका मान धरें
गीत भी अर्पण करें,
और मन दर्पण करें।

पा रहे हैं इससे मनभर,
खुशियों का जहान हम
रक्त रंजित ना धरा हो,
इसका धरें ध्यान हम।

संजीवनी है ये धरा,
खुशियों से भर दें घडा़
इससे बढ़कर कुछ नहीं है,
इस धरा पर है धरा।

पाकर धरा पर जीवन,
हम धन्य हो रहे हैंl
इसलिये ही हम धरा पर,
खुशियों के बीज बो रहे हैंll

परिचय–कार्तिकेय त्रिपाठी का उपनाम ‘राम’ है। जन्म ११ नवम्बर १९६५ का है। कार्तिकेय त्रिपाठी इंदौर(म.प्र.) स्थित गांधीनगर में बसे हुए हैं। पेशे से शासकीय विद्यालय में शिक्षक पद पर कार्यरत श्री त्रिपाठी की शिक्षा एम.काम. व बी.एड. है। आपके लेखन की यात्रा १९९० से ‘पत्र सम्पादक के नाम’ से शुरु हुई और अनवरत जारी है। आप कई पत्र-पत्रिकाओं में काव्य लेखन,खेल लेख,व्यंग्य और फिल्म सहित लघुकथा लिखते रहे हैं। लगभग २०० पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। आकाशवाणी पर भी आपकी कविताओं का प्रसारण हो चुका है,तो काव्यसंग्रह-‘ मुस्कानों के रंग’ एवं २ साझा काव्यसंग्रह-काव्य रंग(२०१८) आदि भी प्रकाशित हुए हैं। काव्य गोष्ठियों में सहभागिता करते रहने वाले राम को एक संस्था द्वारा इनकी रचना-‘रामभरोसे और तोप का लाईसेंस’ पर सर्वाधिक लोकप्रिय कविता का पुरस्कार दिया गया है। साथ ही २०१८ में कई रचनाओं पर काव्य संदेश सम्मान सहित अन्य पुरस्कार-सम्मान भी मिले हैं। इनकी लेखनी का उदेश्य सतत साहित्य साधना, मां भारती और मातृभाषा हिंदी की सेवा करना है।

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