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चिंगु

डॉ.पूजा हेमकुमार अलापुरिया ‘हेमाक्ष’
मुंबई(महाराष्ट्र)

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दिवाली की छुट्टियाँ नजदीक आ रही थीं। बच्चों ने मनाली,शिमला,नैनीताल आदि घूमने की मांग पहले से ही रख दी थी। भला बच्चों को मना भी कैसे किया जाए। इसी बहाने घर से बाहर निकालना भी हो जाता है और बच्चों के साथ एक बार फिर बच्चा बन बचपन जी लेते हैं हम। महानगरीय जीवन में तो काम–काज की भागम-भाग के अतिरिक्त कुछ नहीं। खैर…,

घूमने जाने की जोर-शोर से तैयारी जारी थी। बच्चों ने दादी के साथ बैठ सूची बनाई। कहीं-कोई सामान रह न जाए। श्रीमती भी व्यस्त ही थी। सभी एक-दूसरे से यही प्रश्न करते नजर आते कि,यह रखा क्या ? वो रखा क्या ? सब सामान रख लिया नI कुछ रह तो नहीं गया नI माँ भी इन प्रश्नों को सुन-सुन कर तंग आ गईI आखिर बोल ही पड़ी,-“एक काम करो,पूरा घर बाँधकर ले जाओI अगर कोई सामान रह भी गया तो क्या ? क्या वहाँ कुछ नहीं मिलेगा ? जो रह जाए, वहाँ खरीद लेनाI एक-दो रुपए सस्ती क्या और मंहगी क्या ?” माँ की बात सुन सभी जोर से हँस पड़ेI सामान रखने–रखाने के तनाव में उलझे हम सभी खिलखिला उठेI बात सही भी थीI जहाँ इतना खर्च हो रहा था,वहां छोटी-मोटी चीज की क्या परवाह करनाI

आखिर वह दिन आ गया,जिस दिन हमें अपनी सैर के लिए रवाना होना था। बच्चों की खुशी का ठिकाना न था। कानपुर से दिल्ली तक का सफर हवाई यात्रा से पूरा कर हम दिल्ली पहुंचे। सब-कुछ पहले से ही तय होने के नाते हमारे दिल्ली पहुंचने से पहले ही गाड़ी और ड्राईवर दोनों हाजिर थे। गाड़ी में बैठे-बैठे ही ड्राईवर ने हमें आधी दिल्ली तो यूँ ही घुमा दी। बच्चे तो खुशी से कभी ताली बजा रहे थे,तो कभी अचरज भरी आवाज़ों से विस्मित हो रहे थे। हम सबके दिल उनकी खुशी देख कर से झूम रहे थे। कभी-कभी जिंदगी की व्यस्तता से निकलना भी कितना आवश्यक हो जाता हैI व्यस्तता न जाने जीवन के कितने हसीन पलों को बड़ी ख़ामोशी से अपने आगोश में ले लेती है,इसका हमें कभी आभास ही नहीं होताI

बच्चों की हँसी-खुशी भरे माहौल और रास्ते भर के प्राकृतिक नज़ारों का लुत्फ उठाते हुए हम मनाली पहुँच ही गए। ड्राईवर ने होटल के सामने गाड़ी रोकी और हमें भी उतरने का आग्रह किया। सफर आरामदायक था,मगर दूरी कुछ लंबी होने से हम सभी बुरी तरह थक चुके थे।

गाड़ी से उतरते उससे पहले ही होटल का वॉचमैन ‘जी साबजी’ कहता हुआ हाजिर हो गया। मैं कुछ कहता,लेकिन उसने हमें बोलने का मौका ही न दिया। “साबजी सामान की चिंता मत करो। सब आपके कमरे में आ जाएगा। आप तो बस हमारे होटल और शहर का मजा लीजिए।” ड्राईवर ने भी कहा,-“सर आप चिंता न करें। वॉचमैन सामान आपके रूम में पहुँचा देगाI आप तो चेक इन कीजिएI”

होटल में चेक इन की और हम सब अपने कमरों के बिस्तर पर अपनी थकान मिटाने जा धँसे। कुछ गहरी नींद में उतरते,उससे पहले ही ड्राईवर ने फोन पर संदेश दिया कि घंटे भर में तैयार हो जाइए,हिडिंबा मंदिर देखने जाना है। कल रोहतांग पास के लिए निकलना है,तो देखना मुश्किल होगा।

ड्राइवर की बात सुन चाय-काफी और हल्के से नाश्ते से पेट को शांत किया। जल्दी-जल्दी तैयार हो निकल पड़े। पैगोड़ा की शैली में निर्मित इस मंदिर परिसर की सुन्दरता और शांत वातावरण मन को अत्यंत हरने वाला है। यह मंदिर मनाली शहर के पास के एक पहाड़ पर स्थित है। मनाली आने वाले सभी सैलानी यहाँ जरूर आते हैं। देवदार वृक्षों से घिरे इस मंदिर की खूबसूरती बर्फबारी के बाद देखते ही बनती है। रात को लौटते हुए खाना बाहर ही कर लिया। खाना बेहद स्वादिष्ट और गरमागरम था। पेट तो अपनी संतुष्टि दे चुका था,पर बेईमान मन कहाँ मानता है। ड्राइवर ने बताया कि,हिमाचल में शादी-ब्याह,सामूहिक कार्यक्रम आदि के अवसर पर बनने वाले भोजन को ‘धाम’ कहते हैं और भोजन बनाने वालों को ‘बोटी’ कहते हैंI

होटल लौटे तो देखा कि होटल के गेट पर वॉचमैन के साथ उसके ४ बच्चे भी पहरेदारी में पिता को साझादारी दे रहे थे। कुछ अटपटा लगा,मगर विवशता कदम थाम लेती है। ठंड काफी थी। उस ओर विशेष ध्यान दिए बिना ही हम अपने कमरे में पहुँचेI हम सब अपनी- अपनी रजाई और चिंगु में छिप गए। दोनों बच्चे आपस में कुछ खुसर-पुसर कर रहे थे। मैंने थोड़ा डांटा और सोने को कहा। मेरी आवाज़ सुन दोनों ने चुप्पी साध ली।

मेरे सोने के कोई २ घंटे बाद श्रीमती उठी। दोनों बच्चों को देख हतप्रभ रह गई। धीरे से आवाज़ लगा मुझे उठाया। हमारे दोनों बच्चे कैसे सिकुड़ कर सो रहे हैं। इनका चिंगु कहाँ गया ? यह सुनते ही मेरी आँखें खुल गईं। देखा तो दोनों बच्चे ऐसे ही उघड़े सो रहे हैं। यह देखते ही मेरी नज़र दरवाजे की ओर दौड़ी,कहीं गलती से दरवाजा खुला तो नहीं रह गया,मगर ऐसा न था। बच्चों को अपनी रजाई से ढांक कर मैंने होटल प्रबन्धक को फोन करने के लिए रिसीवर उठाया ही था, कि बड़ी बेटी ने हौले से हाथ पकड़ लिया। पापा हमारा चिंगु….l(कुछ सहमी-सी आवाज में बोलीl)

पापा आपके सोने के बाद मैं और रोनित खिड़की के पास आ कर बैठ गए। हम दोनों आज बहुत खुश थे,इसलिए हमें नींद नहीं आ रही थीI हम दोनों आपस में बातें कर रहे थे कि,आज आप लोगों के साथ घूमने में कितना मज़ा आया। बात करते हुए अचानक हमारी नजर वॉचमैन के बच्चों पर पड़ी,जो कड़कड़ाती ठंड में कंपकंपाते हुए गेट पर पहरा दे रहे थे। हम दोनों से देखा न गया। चुपके से उन्हें आवाज़ लगाई और खिड़की से ही उन्हें चिंगु थमा दिया।

बच्चों की मासूमियत भरी बातें और उनकी सहृदयता देख आँखें नम हो आईं। खिड़की से उचक कर देखा तो चारों बच्चे उस एक चिंगु में ही अपने को समेटे सुकून की नींद भर रहे थे। आज मैं निशब्द था।

अगली सुबह प्रबन्धक को होटल के बिल के साथ चिंगु की कीमत अदा कर,सफर के अगले पड़ाव की ओर बढ़ गए हम। अनजाने में ही सही,मगर बच्चों ने जीवन का बहुत बड़ा फलसफा सिखा दिया।

(इक दृष्टि यहाँ भी: चिंगु=कम्बल,उघड़े–बिना ढके)

परिचय–पूजा हेमकुमार अलापुरिया का साहित्यिक उपनाम ‘हेमाक्ष’ हैl जन्म तिथि १२ अगस्त १९८० तथा जन्म स्थान दिल्ली हैl श्रीमती अलापुरिया का निवास नवी मुंबई के ऐरोली में हैl महाराष्ट्र राज्य के शहर मुंबई की वासी ‘हेमाक्ष’ ने हिंदी में स्नातकोत्तर सहित बी.एड.,एम.फिल (हिंदी) की शिक्षा प्राप्त की है,और पी.एच-डी. की शोधार्थी हैंI आपका कार्यक्षेत्र मुंबई स्थित निजी महाविद्यालय हैl रचना प्रकाशन के तहत आपके द्वारा आदिवासियों का आन्दोलन,किन्नर और संघर्षमयी जीवन….! तथा मानव जीवन पर गहराता ‘जल संकट’ आदि विषय पर लिखे गए लेख कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैंl हिंदी मासिक पत्रिका के स्तम्भ की परिचर्चा में भी आप विशेषज्ञ के रूप में सहभागिता कर चुकी हैंl आपकी प्रमुख कविताएं-`आज कुछ अजीब महसूस…!`,`दोस्ती की कोई सूरत नहीं होती…!`और `उड़ जाएगी चिड़िया`आदि को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्थान मिला हैl यदि सम्म्मान देखें तो आपको निबन्ध प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार तथा महाराष्ट्र रामलीला उत्सव समिति द्वारा `श्रेष्ठ शिक्षिका` के लिए १६वा गोस्वामी संत तुलसीदासकृत रामचरित मानस पुरस्कार दिया गया हैl इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा में लेखन कार्य करके अपने मनोभावों,विचारों एवं बदलते परिवेश का चित्र पाठकों के सामने प्रस्तुत करना हैl

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