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चिकित्सा शिक्षा में नैतिक मूल्यों की सार्थक पहल

ललित गर्ग
दिल्ली

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देश में आज चिकित्सक एवं अस्पताल लूट-खसौट,लापरवाही,भ्रष्टाचार,अनैतिकता एवं अमानवीयता में शुमार हो चुके हैं,आए-दिन ऐसे मामले प्रकाश में आते हैं कि अनियमितता एवं लापरवाही के कारण मरीज का इलाज ठीक ढंग से न होने पाने के कारण मरीज की मौत हो गई या उससे गलत वसूली या लूटपाट की गई। सरकारी अस्पतालों में जहां चिकित्सा सुविधाओं एवं दक्ष चिकित्सकों का अभाव होता है,वहीं निजी अस्पतालों में आज के भगवान रूपी चिकित्सक जो मात्र अपने पेशे के दौरान वसूली व लूटपाट ही जानते हैं। उनके लिए मरीजों का ठीक तरीके से देखभाल कर इलाज करना प्राथमिकता नहीं होती,उन पर धन वसूलने का नशा इस कदर हावी होता है कि वह उन्हें सच्चे सेवक के स्थान पर शैतान बना देता है। यह शर्मनाक ही नहीं, बल्कि चिकित्सा पेशे के लिए बहुत ही घृणित है। इन अमानवीयता एवं घृणा की बढ़ती स्थितियों पर नियंत्रण की अपेक्षा लगातार महसूस की जाती रही है,इस दिशा में एक सार्थक पहल हुई है कि एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में व्यापक परिवर्तन होने जा रहा है,जिसमें उन्हें चिकित्सा का तकनीकी ज्ञान देने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यह स्वागत योग्य है कि अगले सत्र से एमबीबीएस के छात्र जिस परिवर्तित पाठ्यक्रम से परिचित होंगे, उसमें उन्हें मरीजों के साथ सही तरह से पेश आने की शिक्षा दी जाएगी।
चिकित्सक का पेशा एक विशिष्ट पेशा है। एक चिकित्सक को भगवान का दर्जा दिया जाता है,इसलिये इसकी विशिष्टता और गरिमा बनाए रखी जानी चाहिए। एक कुशल चिकित्सक वह है,जो न केवल रोग की सही तरह पहचान कर प्रभावी उपचार करे,बल्कि रोगी को जल्द ठीक होने का भरोसा भी दिलाए। कई बार वह भरोसा,उपचार में रामबाण की तरह काम करता है। ऐसे में एमबीबीएस छात्रों के पाठ्यक्रम में चिकित्सकों और मरीजों के रिश्ते को भी शामिल किया जाना उचित ही है। बदले हुए पाठ्यक्रमों में एमबीबीएस के छात्रों को उपचार के दौरान रोगियों से प्रभावी संवाद के तौर-तरीकों से परिचित कराने के साथ ही उन्हें नैतिक शिक्षा का प्रभावी प्रशिक्षण दिया जायेगा। एक व्यक्ति चिकित्सक,अभियंता, वकील,न्यायधीश बनने से पहले अच्छा इंसान बने,तभी वह अपने पेशे के साथ न्याय कर सकते हैं।
नैतिक शिक्षा को शैक्षणिक स्तर के पाठ्यक्रम का हिस्सा होना बहुत जरूरी है,क्योंकि आज के युग की एक बड़ी समस्या यही है कि भावी पीढ़ी शिक्षित तो हो रही है,लेकिन अपेक्षित संस्कारों,नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों का उनमें नितांत अभाव होता है। समाज और राष्ट्र के हित के लिए वह आवश्यक ही नहीं,अनिवार्य है कि शालेय शिक्षा से लेकर पेशेवर शिक्षा तक, सब जगह नैतिक शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाए। शिक्षित होना तभी सार्थक है,जब हमारे छात्र बेहतर नागरिक भी बनें। अन्यथा सारी व्यवस्थाएं,जिम्मेदारियां एवं राष्ट्रीय चरित्र धुंधला होता जाएगा,स्थितियां अनियंत्रित हो जाएगी। देखने में आ रहा है कि नियंत्रण से बाहर होती हमारी व्यवस्था हमारे लोक जीवन को अस्त-व्यस्त कर रही है। प्रमुख रूप से गलती चिकित्सकों के शिक्षण-प्रशिक्षण में है। कहीं,क्या कोई अनुशासन या नियंत्रण है ? निरंतर मरीजों से लूटपाट एवं लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं। चिकित्सा का क्षेत्र सेवा का मिशन न होकर एक व्यवसाय हो गया है। चिकित्सकों की गैरजिम्मेदारी के कारण अनेक मरीज अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं, कोई जिम्मेदारी नहीं लेता-कोई दंड नहीं पाता। भारत में मुर्गी चुराने की सजा छह महीने की है,पर एक मरीज के जीवन से खिलवाड़ करने के लिए कोई दोषी नहीं,कोई सजा नहीं। चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ रहा इस तरह का अपराधीकरण अपने चरम बिन्दु पर है। वर्ष २०१३ के एक शोध के मुताबिक दुनिया में हर साल करीब ४.३ करोड़ लोग असुरक्षित चिकित्सीय देखरेख के कारण दुर्घटना का शिकार होते हैं। रिपोर्ट में पहली बार ये पता लगाने की कोशिश की गई थी कि चिकित्सीय भूल के कारण हुई दुर्घटना में साल में कितनी मानवीय जिंदगी का नुकसान होता है ।
सरकारी स्वास्थ्य ढांचे से इतर निजी क्षेत्र ने अपना एक अहम स्थान बना लिया है, जिसने चिकित्सा की मूल भावना को ही धुंधला दिया है। निजी अस्पतालों की स्थिति तो बहुत डरावनी है,वहां पैसे हड़पने के लिए लोगों को बीमारी के नाम पर डराया जाता है। उन्हें वो परीक्षण-जाँच करने को कहा जाता है,या फिर उन पर वो सर्जरी और ऑपरेशन किए जाते हैं,जिसकी कोई जरूरत नहीं होती। साथ ही चिकित्सा पेशे में दलाली के चलन भी बहुत बढ़ते जा रहे हैं,यानि चिकित्सकोंl की दवा कंपनियों या जाँच केन्द्रों के बीच कमीशन को लेकर सांठगांठ। भारत में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं खस्ताहाल होने के कारण निजी अस्पतालों का ८० प्रतिशत बाजार पर कब्जा है। आरोप लग रहे हैं कि कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन के कारण निजी अस्पतालों की जवाबदेही की भारी कमी है।
अपराधी केवल वे ही नहीं,जिनके हाथ में ए.के.४७ है। वे भी हैं,जो चिकित्सा से जुड़ी आचार-संहिता को तोड़ रहे हैं या जिनके दिमागों में येन-केन-प्रकारेण धन कमाने की अपराध भावना है। आज चिकित्सा पेशा नियंत्रण से बाहर हो गया है। स्वार्थी सोच वाले व्यक्ति नियंत्रण से बाहर हो गए हैं और सामान्य आदमी के लिए जीवन नियंत्रण से बाहर हो गया है। चिकित्सक,पैसे की संस्कृति यानी स्वर्ण मृग के पीछे भाग रहे हैं-चरित्र रूपी सीता पूर्णतः असुरक्षित है। आज हमारे पास कोई राम या हनुमान भी नहीं है। अनेक राष्ट्र-पुरुष हो गए हैं जिन्होंने चरित्र की रोशनी दी,चरित्र को स्वयं जीया,लेकिन भगवानरूपी चिकित्सक अपने चरित्र एवं नैतिकता को दीवार पर लटकाकर स्वच्छंद हैं। इसलिये,एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में नैतिक मूल्यों के प्रशिक्षण को आवश्यक समझा गया,क्योंकि बीते कुछ समय से मरीजों और उनके परिजनों की चिकित्सकों एवं अस्पतालों से शिकायतें बढ़ी हैं। कई बार तो तीमारदारों और चिकित्सकों में मारपीट की नौबत तक आ जाती है। इसी तरह चिकित्सा महाविद्यालयों के परिसर अथवा उनके इर्द-गिर्द वैसे झगड़े भी खूब बढ़े हैं,जिनमें एक पक्ष कनिष्ठ चिकित्सकों का होता है। इसके मूल में कहीं न कहीं सदाचरण का अभाव है तो इसे निराधार नहीं कहा जा सकता।
खेद का विषय है कि हमारी शिक्षा केवल बौद्धिक विकास पर ध्यान देती है। हमारी शिक्षा शिक्षार्थी में बोध जाग्रत नहीं करती, वह जिज्ञासा नहीं जगाती,जो स्वयं सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करे और आत्मज्ञान की ओर ले जाए। सही शिक्षा वही हो सकती है जो शिक्षार्थी में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित कर सके। एमबीबीएस छात्रों को इस तरह से प्रशिक्षित करना नितांत जरूरी है। इसके लिए धीरे-धीरे अब माहौल बना है और ऐसा लगता है कि पाठ्यक्रम में तब्दीली करके एक तरह की एक बड़ी भूल को सुधारने का प्रयत्न हो रहा है। जो भी हो,वह अच्छा है कि कुछ देर से सही, एमबीबीएस पाठ्यक्रम में बदलाव के बारे में सोचा गया और उसमें नई तकनीक के साथ ऐसे पाठ भी शामिल किए जा रहे हैं ताकि चिकित्सक फैसले लेने की क्षमता से भी सक्षम हो सकें और अपनी नैतिक जिम्मेदारियों को भी समझ कर मरीजों के साथ मानवीय व्यवहार करने की पात्रता विकसित कर सकें।

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