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याद रखो – जहाँ चाह, वहाँ राह

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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नगर का नाम था ‘सुविधापुर’, पर वहाँ सुविधाएँ केवल नेताओं और अफसरों की जेब में रहती थीं। आम आदमी तो ‘आसमान से गिरा, खजूर में अटका’ जैसी हालत में जी रहा था। चुनाव आते ही नेता ‘मुँह में राम, बगल में छुरी’ लेकर गलियों में उतरते, बड़े-बड़े वादे करते और फिर जनता को ‘ठेंगा दिखाकर’ पाँच साल गायब हो जाते।
   शहर के युवा भी धीरे-धीरे निराशा के दलदल में फँसते जा रहे थे। Hindibhashaa@432#@657##कोई बेरोज़गारी से टूटा था, कोई भ्रष्टाचार से। कई तो ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ जैसी योजनाओं को देखकर व्यवस्था से ही भरोसा खो बैठे थे।
    इसी नगर में आदित्य नाम का युवक रहता था। उसने देखा कि लोग केवल शिकायत करते हैं, पर ‘अपने गिरेबान में झाँकने’ को तैयार नहीं। उसने अपने मित्रों को बुलाया और कहा— “यदि हम ही ‘हाथ पर हाथ धरे’ बैठे रहेंगे, तो बदलाव कौन लाएगा ? दूसरों के भरोसे बैठना ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ जैसा है।”
धीरे-धीरे युवाओं का समूह बन गया। उन्होंने मोहल्लों में स्वच्छता अभियान चलाया, रिश्वतखोरी के खिलाफ आवाज़ उठाई और बेरोज़गार युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देना शुरू किया। शुरू में कुछ लोग उनका मज़ाक उड़ाते रहे। कहते— “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।”, पर आदित्य मुस्कराकर जवाब देता— “जब चने संग युवाशक्ति जुड़ जाए, तो पत्थर भी दरक जाते हैं।”
एक दिन नगर में सांस्कृतिक उत्सव हुआ। वर्षों से वहाँ फूहड़ता और दिखावे का बोलबाला था। आदित्य और उसकी टोली ने लोकगीत, नाटक और स्वतंत्रता सेनानियों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत किए। लोगों को पहली बार लगा, कि अपनी मिट्टी की खुशबू अभी मरी नहीं है।
     उधर, भ्रष्ट नेताओं की ‘दाल नहीं गलना’ शुरू होने लगी। जनता सवाल पूछने लगी। युवाओं ने सोशल मीडिया को केवल मनोरंजन नहीं, जागरण का माध्यम बनाया। अब लोग समझ चुके थे कि ‘घर का भेदी लंका ढाए’ केवल कहानी नहीं, समाज की सच्चाई भी है।
कुछ महीनों बाद नगर का चेहरा बदलने लगा। दीवारों पर नफ़रत नहीं, शिक्षा और सद्भाव के संदेश लिखे जाने लगे। आदित्य ने सभा में कहा— “युवाओं! व्यवस्था को कोसने से कुछ नहीं होगा। यदि समाज बदलना है, तो पहले स्वयं बदलो। याद रखो— ‘जहाँ चाह, वहाँ राह।’”
   उस दिन पहली बार सुविधापुर सचमुच सुविधाओं से नहीं, संस्कारों से समृद्ध दिखाई दिया।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥