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जानते हुए भी गलत कार्य क्यों करते हैं ?

अमल श्रीवास्तव 
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अति सुंदर प्रश्न किया था कि,हर व्यक्ति अपना भला-बुरा,धर्म-अधर्म,पाप-पुण्य,उचित-अनुचित समझता है,फिर भी जबरदस्ती,न चाहते हुए भी पाप और अधर्माचरण में लिप्त क्यों हो जाता है।
दुर्योधन ने भी कहा था कि,-
“जानामि धर्मम् न च में प्रवृत्ति,
जानामि अधर्मम् न च में निवृत्ति।”
अर्थात मैं धर्म भी जानता हूँ पर मेरी उसमें प्रवृत्ति(अभिरुचि) नहीं है,और अधर्म भी जानता हूँ,पर उससे मैं छूट नहीं पाता।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में लिखा है कि,-
“हित,अनहित पशु,पक्षी जाना।”
यह परिस्थिति और मनःस्थिति लगभग सभी के जीवन में आती है। ऐसी कौन-सी प्रेरक शक्ति है,जो मनुष्य को बलात् पाप कर्मों में प्रवृत्त कर देती है ??
इसके तीन प्रबल कारण हैं,जिनका उपचार भी अलग-अलग तीन स्तरों पर किया जाना चाहिए-
#पाप ग्रहों का दुष्प्रभाव
हम सभी का जीवन ग्रह,नक्षत्रों से प्रभावित और संचालित होता है। दिन, महीने,साल की तरह ही शुभ ग्रह और पाप ग्रहों का चक्र हमारे जीवन में आता जाता रहता है। शुभ ग्रहों के समय में मनुष्य शुभ कर्मों की ओर प्रेरित होता है और अशुभ ग्रहों,पाप ग्रहों के प्रभाव से पाप कर्मों की ओर प्रेरित होता है।
ग्रहों के अनिष्ट प्रभावों से बचने के लिए ग्रह शांति,ग्रह से सम्बंधित वस्तुओं के दान,और विशिष्ट साधकों द्वारा विनिर्मित रक्षा कवच धारण करने से इससे बचा जा सकता है। बीमारी,दुर्घटनाएं जीवन में उतार-चढ़ाव आदि इस कारण भी होते रहते हैं।
#भूत-प्रेत,जिन्न आदि अदृश्य ताकतें
जिस तरह ‘शक्तिमान’ धारावाहिक में अदृश्य ताकतें किसी के शरीर में घुसकर उससे गलत कार्य करवा लेती थीं,उसी प्रकार धर्म से विमुख,माँस,मदिरा,आदि खाने वाले,अपवित्र जीवन जीने वालों में भूत,प्रेत,जिन्न आदि दुष्ट आत्माएं प्रवेश कर उन्हें गलत कार्य करने के लिए विवश कर देती है। इनका असर ज्यादातर कमजोर मानसिकता के लोग,बच्चों,बालिकाओं ,स्त्रियों,पशुओं पर पड़ता है।
अतः इनका उपचार भी पूजा,हवन,रक्षा कवच आदि से किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक कारण

यह मानव मन की कमजोरी है,जिस पर प्रयासपूर्वक विजय प्राप्त करना होता है।
जिस तरह हमारे घर में टीवी नहीं हो, बच्चे बेचैन किये रहते हों,तो एक दिन आप बाजार से एक बढ़िया रंगीन टीवी ले आते हैं। घर में सब खुशी से उछलने लगते हैं। सारा घर एकसाथ बैठ कर ये नाटक,वो फ़िल्म,कभी क्रिकेट मैच देखने में लग जाता है। कुछ दिन लगता है जैसे सारी दुनिया की खुशियाँ हासिल हो गयी हों।
फिर धीरे धीरे वो नशा उतरने लगता है। २-४ महीने में टीवी घर के कोने में पड़ा रहता है। बच्चे कभी कार्टून या क्रिकेट मैच देख लेते हैं तो महिलाएं कोई मनपसंद नाटक देख लेती हैं,गृहस्वामी कभी-कभी समाचार देख लेते हैं। अब मन भर गया,टीवी का चस्का खत्म हो गया।
जीवन में अधिकाँश वस्तुओं,रिश्ते-नातों के साथ भी यही होता है। मन भर जाता है,क्योंकि मन चंचल और परिवर्तनशील जो है,पर यदि पत्नी-पति,पिता-पुत्र,माँ-बेटे,अच्छे मित्र,या अन्य नजदीकी रिश्तों से मन भर जाए तो पूरा सामाजिक ताना-बना ही तहस-नहस हो सकता है,इसलिए वहाँ रिश्ता निभाने के लिए बार-बार मन लगाना चाहिये,ताकि जीवन में जीवंतता बनी रहे,क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,और समाज में पग-पग पर रिश्ते नातों की जरूरत पड़ती है।
ठीक इसी प्रकार भक्त-भगवान का, और गुरु-शिष्य का रिश्ता होता है। मन बार-बार सदगुरू भगवान के श्रीचरणों में लगाना चाहिए,उनकी महिमा का चिंतन- मनन करते रहना चाहिए ताकि मन न भरे। शिष्य यदि ऐसा न करे तो,फिर कहीं ठौर ठिकाना नहीं रहता,व्यक्ति बेसहारा हो जाएगा। जीवन के संघर्षों में अकेला पड़ जायेगा,हताशा-निराशा के गर्त में चला जायेगा।
जब कुछ लोग,उत्सुकतावश साधना के चमत्कारों से प्रभावित हो थोड़ी-बहुत साधना शुरू करते हैं तो वे माँ आदिशक्ति गायत्री को या किसी देवशक्ति को चमत्कारी मानकर अपने को सत्पात्र बनाने की बजाय कुछ ज्यादा ही चमत्कारिक प्रतिफल की उम्मीद लगा लेते हैं। कुछ दिनों में ही जब उन्हें उनके मनोनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं होते तो निराश हो जाते हैं,या नास्तिक बन जाते हैं,जबकि गायत्री साधना एक सुनिश्चित विज्ञान है। न्यूटन के नियम के अनुसार हर क्रिया की प्रतिक्रिया उसके समान स्तर की होती है। इसी को अध्यात्म की भाषा में ‘कर्मफल का सिद्धांत’ कहते हैं।
गायत्री साधना में भी आपके श्रद्धा-निष्ठा-समर्पण के अनुसार सुनिश्चित परिणाम प्राप्त होते हैं। ये भक्ति का नशा उतरना नहीं चाहिए। इसीलिए,गुरु नानक ने कहा था-
“राम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन-रात।”
मीरा ने कहा था-
“ऐसो रंग दे कि रंग नाहिं छूटे,
धोबिया धोये चाहे सारी उमरिया,रंग दे चुनरिया।”
अन्यथा-
“मन लोभी,मन लालची,मन चंचल,मन चोर,
मन के चले न चालिये,ठौर ठौर कछु और।”
इसलिए अपने-आपको गलत विचार, गलत वचन,गलत कर्म से बचाने के लिए नित्य साधना,स्वाध्याय,संयम,सेवा को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। अपने गुण,कर्म,स्वभाव में आवश्यक सुधार करना चाहिए,और इन सबके लिए गायत्री साधना एक अमोघ औषधि है।

परिचय-रायपुर में  बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत अमल श्रीवास्तव का वास्तविक नाम शिवशरण श्रीवास्तव हैl`अमल` इनका उपनाम है,जो साहित्यकार मित्रों ने दिया हैl अमल जी का जन्म म.प्र. के कटनी जिले के ग्राम करेला में हुआ हैl आपने गणित विषय से बी.एस-सी.की करके बैंक में नौकरी शुरू कीl आपने तीन विषय(हिंदी,संस्कृत,राजनीति शास्त्र)में एम.ए. भी किया हैl आपने रामायण विशारद की भी प्राप्त की है,तो पत्रकारिता एवं आलेख संरचना का प्रशिक्षण भी लिया हैl भारतीय संगीत में आपकी रूचि है,इसलिए संगीत में कनिष्ठ डिप्लोमा तथा ज्योतिष में भी डिप्लोमा प्राप्त किया हैl वर्तमान में एम्.बी.ए. व पी-एचडी. जारी हैl शतरंज के उत्कृष्ट खिलाड़ी,वक्ता और कवि श्री श्रीवास्तव कवि सम्मलेनों-गोष्ठियो में भाग लेते रहते हैंl मंच संचालन में महारथी अमल जी लेखन विधा-गद्य एवं पद्य हैl देश के नामी पत्र-पत्रिका में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैंl रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केन्द्रों से भी हो चुका हैl विभिन्न धार्मिक,सामाजिक,साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े होकर प्रांतीय पदाधिकारी भी हैंl गायत्री परिवार से भी जुड़े होकर कई प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कृत होते रहे हैंl महत्वपूर्ण उपलब्धि आपके प्रथम काव्य संकलन ‘अंगारों की चुनौती’ का म. प्र. हिंदी साहित्य सम्मलेन द्वारा प्रकाशन एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा उसका विमोचन सहित राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय द्वारा सम्मानित किया जाना हैl