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ज्ञान की मशाल

राधा गोयल
नई दिल्ली
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२ दोस्तों अरुण और वरुण के बीच आजकल के शिक्षक और शिक्षा प्रणाली पर बातचीत चल रही थी। वरुण बोला-“पढ़ने में बिल्कुल दिल नहीं लगता। पढ़ कर भी क्या कर लेंगे।मैं तो बिल्कुल ऊब गया हूँ।”
अचानक बातचीत एक अलग दिशा की तरफ मुड़ गई। अरुण बोला- “हम यहां सुख-सुविधाओं के बीच रहकर पढ़ रहे हैं, आवागमन के भरपूर साधन हैं। शहरी जीवन की सुख व सुरक्षा के बीच हम कभी यह नहीं जान पाते कि दुर्गम इलाकों में बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षक कितना परिश्रम कर रहे हैं। शिक्षक और बच्चे नदी, जंगल, पहाड़ और लैंडमाइन पार कर विद्यालय पहुँच रहे हैं तो कहीं शाला पर बम बरस रहे हैं, पर शिक्षक और ज्ञान रुकते नहीं।”
“तू कहना क्या चाहता है अरुण ?”
“आज जो कहना चाहता हूँ, बता रहा हूँ। पहले पूरी बात सुन ले। इसी साल १५ अगस्त २०२३ तो पता है ना ?”
“आजादी का दिन था। यह भला किसको नहीं पता होगा ? कैसी बेवकूफी भरी बात कह रहा है। वो बात बता, जो बताना चाह रहा है।”
“हाँ, वही बता रहा हूँ। बीजापुर में एक गाँव है पदमोर। १५ अगस्त को सुबह उस विद्यालय में तिरंगा फहराने की तैयारी चल रही थी, तभी नक्सली वहाँ पहुँचे। तिरंगा फाड़ दिया और वहाँ काला झंडा फहरा दिया।”
“कहाँ पर है यह गाँव ?
“यह गाँव छत्तीसगढ़ की राजधानी से तकरीबन ५०० किलोमीटर दूर बीहड़ जंगलों में बसा हुआ है और नक्सलियों का कोर इलाका है। इस इलाके में पैदा हुआ हर बच्चा माँ की गोद से ज्यादा नक्सलियों की दहशत को जानता है।”
“कमाल है।”
“अभी और कमाल सुन, जिसे सुनकर तुझे यकीन नहीं होगा। इस गाँव में न सड़क है, न मोबाइल नेटवर्क। न बिजली, न पीने का साफ पानी। आधुनिकता का कोई निशान नहीं। वहाँ शिक्षक कमर तक बहती नदी पार करके रोज बच्चों को पढ़ाने जाते हैं, क्योंकि उन्हें यकीन है कि शिक्षा ही उनकी अंधेरी जिंदगी में रोशनी लाएगी ।” अरुण ने बताया।
“भला ऐसा कौन शिक्षक होगा जो ऐसे मुश्किल हालात में भी बच्चों को पढ़ाने की हिम्मत दिखा रहा है अरुण ?
“है, ऐसा ही एक शिक्षक है वरुण।”
“क्या नाम है उनका ?”
“उनका नाम है शिवचरण। वह उस गाँव के ५८ बच्चों को आतंक के साए से निकालकर एक दिन इस दुनिया में जीने, सपने देखने और आगे बढ़ने के काबिल बना रहे हैं। नक्सलियों का लगाया वह काला झंडा अब भी मौजूद है, लेकिन उससे न शिवचरण का हौंसला टूटा है, न बच्चों का टूटा है। एक दिन एक टीम को यह पता लगा तो सच्चाई देखने वहाँ पहुँची। तब उन्होंने देखा कि शिवचरण और उनके जैसे अन्य प्राथमिक विद्यालय शिक्षक रोज की तरह साइकिल से कामकानार गाँव पहुँचे। ध्यान से सुन कि वह शाला कितनी दूर है। पहले साइकिल से कामकानार गाँव पहुँचे। वहाँ से आगे २ किलोमीटर लंबी पगडंडी पैदल पार करी और फिर नदी के किनारे आए।”
“कौन-सी नदी ?”
“उसका नाम है बेरुदी नदी। नदी अपने उफान पर थी। शिक्षकों ने कपड़े उतार कर बैग में रखे और बैग सिर पर रखकर नदी पार करने लगे। बिल्कुल वैसे, जैसे हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पढ़ने जाते थे। उनकी कहानी बाद में बताऊँगा। जो टीम देखने गई थी, वह भी उनके पीछे कमर तक पानी में डूबे नदी पार करने लगे। नदी पार करने के बाद भी २ कि.मी. का पैदल का रास्ता था और बेहद घने जंगल। २५ मिनट तक चलने के बाद वह लोग जायगोया पहुँचे। बच्चे वहाँ पहले से ही कक्षा में मौजूद थे और खुद से पढ़ रहे थे। उन बच्चों की आँखों में सीखने और आगे बढ़ने की जो ललक थी, वह इन्हें देखकर ही महसूस की जा सकती है।
और पता है यह सब कुछ किसलिए संभव हो पाया ? क्योंकि अध्यापक पूरी तरह से बच्चों के भविष्य को लेकर समर्पित हैं। उनका उद्देश्य केवल वेतन पाकर खाना पूर्ति करना नहीं है, बल्कि वे बच्चों को एक योग्य और निडर नागरिक बनाना चाहते हैं जो समाज और देश के निर्माण में अपना सहयोग कर सकें क्योंकि तूने सुना भी है ना कि ‘अध्यापक राष्ट्र का निर्माता होता है’।”
“लेकिन सारे अध्यापक तो ऐसा नहीं करते। हमारे विद्यालय में देख लो। हम शिक्षक से कुछ पूछें तो हमें कोहनी मारता है और कहता है तुम्हें इतना भी नहीं मालूम ? ज्यादा प्रश्न पूछने हैं तो मुझसे ट्यूशन लेना शुरू कर दो।”
“तू ठीक कह रहा है वरुण। आजकल इस तरह की भी मानसिकता हो गई है, लेकिन सभी तो ऐसे नहीं होते। अब तू पहले पूरी बात सुन। जिस गाँव की कहानी तुझे मैंने सुनाई है, इस गाँव में लोगों के पास राशन कार्ड तो हैं, लेकिन आधार कार्ड नहीं है। स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। पीने का साफ पानी नहीं है। बिजली का तार पहुँच तो गया है लेकिन तारों में करंट शायद ही कभी आता हो।”
“हे राम! कमाल है। कितना मुश्किल है ऐसे माहौल में जीना और पढ़ना !”
“बिल्कुल ठीक कहा तूने। जो टीम वहाँ इन दोनों विद्यालयों को देखने गई थी, उनके बारे में बताता हूँ। ये टीम जायगोया से पदमोर गाँव गई। जायगोया से पदमोर का रास्ता ५ कि.मी. था और घने जंगलों के बीच से होकर था, लेकिन जंगलों के बीच से जाना मजबूरी थी, इसलिए ५ कि.मी. का रास्ता 1 घंटे में तय हुआ। शिवचरण यहाँ बच्चों को उनकी मातृभाषा गोंडी और हिंदी में भी पढ़ा रहे हैं।
तुझे और दूसरी कहानी सुनाता हूँ। १० महीने पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो प्रचारित हुआ था। शायद तूने भी देखा होगा। उसमें एक १२ साल की बच्ची किसी मंझे हुए खिलाड़ी की तरह बल्ले को हवा में घुमा कर गेंद को दसियों फीट दूर उछाल दे रही है। बिजली की रफ्तार से दौड़-दौड़ कर रन बना रही है। छठी कक्षा की इस बच्ची का सपना है कि, वह बड़ी होकर विराट कोहली की तरह क्रिकेट खेले। और मालूम है यह शाला कहाँ है ?”
“कहाँ है ?
“एक गाँव है काकसर। कारगिल की सीमा से ३० किलोमीटर दूर है। यह सरकारी विद्यालय एलओसी पर बना है। इसमें पढ़ने वाले बच्चों और शिक्षकों ने युद्ध और तबाहियों के मंजर देखे हैं। गोलियाँ खाई हैं, लेकिन इस दहशतगर्दी के बीच विद्यालय की मशाल लिए खड़ा है। १९५२ में बने इस विद्यालय ने कई पीढ़ियों को शिक्षा और हुनर की रोशनी दी है। इस सुदूर दुर्गम गाँव के विद्यालय से पढ़कर निकले बच्चे आज देश-दुनिया में जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं। एक बार तो शाला में कक्षा चल रही थी। सीमा पार से गोलियाँ बरसने लगीं। उस गोलीबारी में एक शिक्षक की बहन मारी गई। बम के जहरीले धुएं के कारण तकरीबन २५ अन्य बच्चे अपनी जान गवाँ बैठे। इस गाँव की आबादी मात्र १ हजार है। इतना सब-कुछ होने के बाद भी इनके हौंसले बुलंद हैं। बच्चे अब भी शाला में पढ़ने जाते हैं, क्योंकि इस गाँव के लोगों को इन सब बातों को देखने और सहने की आदत हो गई है। २०१९ तक यह माध्यमिक विद्यालय था, जो अब उच्चतर माध्यमिक हो गया है। इस शाला के बच्चों का सफर हमेशा ही मुश्किलों भरा रहा है। यह ३ तरफ से पाकिस्तानी चौकियों से घिरा हुआ है। इसके बावजूद सुबह की प्रार्थना जरूर होती है। कई बार सीमा पार से सेना के बूटों और चलने वाली गोलियों की गूँज भी सुनाई देती है। १९९१, ९३ और ९९ में कारगिल युद्ध के दौरान बम के गोलों ने इस विद्यालय को भी नेस्तनाबूद कर दिया था, लेकिन लोगों के हौंसले को नहीं तोड़ पाए। विद्यालय अब भी चल रहा है। मेरे मम्मी-पापा बता रहे थे। एक बार वह चार धाम की यात्रा पर गए थे। तब केदारधाम भी गए थे। वो बता रहे थे कि केदारनाथ की घाटी में बच्चे कंधों पर स्कूल बैग टाँग कर घाटी में से ऊपर पहाड़ पर इस तरह आ रहे थे, जैसे सड़क पर चल रहे हों और खाई के किनारे-किनारे चल रहे थे। पापा बता रहे थे कि, उन्हें डर लग रहा था कहीं बच्चे खाई में ना गिर जाए लेकिन बच्चे बिल्कुल निडर होकर चल रहे थे।”
“भाई अरुण! तूने सही कहा। शहरी जीवन की सुख-सुरक्षा में घिरे हम सोचते भी नहीं कि, इसी देश के किसी हिस्से में बच्चों के लिए शाला और शिक्षा इतनी दुर्लभ और इतनी कीमती चीज है।अब मैं मन लगाकर पढ़ूँगा। कुछ कौशल विकास की कक्षा भी ज्वाइन करूँगा और बच्चों को वो हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनाने में मदद करने के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण के लिए भी प्रेरित करूँगा।”