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तू मूर्ख,मैं महामूर्ख !!

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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‘सर्जिकल स्ट्राइक’ फिर से राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गई है। सितंबर २०१६ में जब सरकार ने प्रचार किया था कि उसने पाकिस्तान पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है,तभी मैंने लिखा था कि यह ‘फर्जीकल स्ट्राइक’ है। हमारे प्रचार मंत्री को यह पता ही नहीं है कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ क्या होती है ?,लेकिन प्रचार मंत्री की ताकत का लोहा मानना पड़ेगा कि,उन्होंने कांग्रेस को अब मजबूर कर दिया है कि वह भी अपनी ‘सर्जिकल स्ट्राइकों’ की डोंडी पीटने लगी है। उसका कहना है कि अगर मोदी ने एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है तो मनमोहनसिंह ने ६ की थी,लेकिन उसका प्रचार नहीं किया था। कांग्रेस ने उन स्ट्राइकों के नाम और तिथि भी प्रसारित की है। यह ऐसा ही है कि जैसे अखाड़े में भिड़ रहे दो पहलवानों में से पहला कहे कि मैं मूर्ख हूँ,तो दूसरा अपने-आपको बड़ा सिद्ध करने के लिए कहे कि मैं महामूर्ख हूँ। इन सर्जिकल स्ट्राइक करनेवाली सरकारों से कोई पूछे कि आपकी ये फौजी शल्य-चिकित्सा क्या मजाक साबित नहीं हुई है ? ऐसी फौजी कार्रवाइयां नरसिंहरावजी,अटलजी और डाॅ.मनमोहनसिंह की सरकारें दसियों बार कर चुकी हैं लेकिन उन्होंने कभी इनके नगाड़े नहीं पीटे। वे नगाड़े पीटने लायक थीं भी नहीं। सर्जिकल स्ट्राइक के नगाड़े पीटने की जरुरत ही नहीं पड़ती है। अगर वे सचमुच हों तो अपने- आप नगाड़े पिटने लगते हैं। १९६७ में इस्राइल ने जब मिस्र के सैकड़ों जहाज एक ही झटके में उड़ा दिए थे,१९७६ में इस्राइली कमांडो ने उगांडा के एंटेबी हवाई अड्डे और १९८१ में ओसीराक के परमाणु-संयंत्र पर हमला किया था,१९८३ में जब अमेरिका ने सद्दाम के एराक पर खंजर भौंका था,अफगानिस्तान में फजलुल्लाह का सिर कलम किया था और पाकिस्तान के जबड़े से उसामा बिन लादेन को खींच लाया था,तब कहा जा सकता था कि यह सर्जिकल स्ट्राइक हुई है। आपकी स्ट्राइकों में आपने क्या किया,सद्दाम और उसामा तो क्या,आप एक मच्छर भी नहीं मार सके। आपकी सर्जिकल स्ट्राइकों के बावजूद आपकी संसद पर हमला हुआ, आपकी मुंबई की होटलों पर आतंकी टूट पड़े,आपके फौजी अड्डों पर भी मार पड़ गई,पुलवामा में सामूहिक हत्याकांड हो गया। यदि एक भी सच्ची ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ हो जाती तो पाकिस्तान कश्मीर का नाम ही भूल जाता। सर्जिकल स्ट्राइक के जो वीडियो हमारी सरकार ने दिखाए,वे भी इतने बेजान थे कि उन्हें देखने के बाद लग रहा था कि सरकार खुद ही सिद्ध कर रही है कि उसकी सर्जिकल स्ट्राइक कितनी फर्जी थी। अब इस फर्जीवाड़े में देश की दोनों पार्टियां फंस गई हैं।

परिचय-डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।