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नव फसल का स्वागत संक्रांति त्योहार

डॉ. आशा गुप्ता ‘श्रेया’
जमशेदपुर (झारखण्ड)
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मकर संक्रांति विशेष….

हमारे भारत वर्ष की संस्कृति अति ही बहुमूल्य है। यहाँ के अनेक त्योहार हैं, जो एकसाथ देश में मनाए जाते हैं। आंग्ल नववर्ष के प्रथम माह जनवरी उत्साह से भरे ‘मकर संक्रांति पर्व’ का है।
भारत में संक्रांति का त्योहार हर्ष-उल्लास से मनाया जाता है। यह हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में एक है। यह पर्व पड़ोसी देश नेपाल में भी मनाते हैं। जब सूर्य के उत्तरायण होते हैं, तभी इस त्योहार को मनाया जाता है। इस पर्व की विशेष बात यह है कि, यह अन्य त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं, बल्कि हर साल १४ जनवरी को ही मनाया जाता है। संक्रांति का सीधा संबंध पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से है। जब भी सूर्य मकर रेखा पर आता है, वह दिन १४ जनवरी ही होता है।
इस समय ऋतु में भी परिवर्तन होता है, और नई फसल तैयार होती है। कहा जाए तो यह नई फसल के स्वागत का भी त्योहार है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। इस दिन नए कपडे़ पहन, रंगोली बनाकर नए अन्न से देव की पूजा-अर्चना करते हैं और स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत ‘लोहड़ी’ पर्व के रुप में मनाया जाता है।तिल और गुड़ का भी संक्राति पर बेहद महत्व है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर तिल का उबटन कर स्नान किया जाता है। सूर्य देव को जल अर्ध्य चढा़ते हैं, दान करते हैं।
संक्रांति को स्नान और दान का महापर्व भी कहा जाता है। इस दिन गंगासागर, हरिद्वार, प्रयाग नदी तीर्थ स्थानों एवं अन्य पवित्र नदियों में स्नान का बहुत महत्व है।
वैज्ञानिक महत्व के अनुसार मकर संक्रांति के दिन से ही जलाशयों में वाष्पन क्रिया शुरू होने लगती है, जिसमें स्नान करने से स्फूर्ति व ऊर्जा का संचार होता है। इसी कारण इस दिन पवित्र नदी और जलाशयों में स्नान करने का महत्व माना गया है। इस दिन गुड़ व तिल खाने का महत्व है, क्योंकि इससे शरीर को उष्णता व शक्ति मिलती है।

इन सभी मान्यताओं के अलावा मकर संक्रांति पर्व एक सुंदर उत्साह से भी जुड़ा है। इस दिन पतंग उड़ाने का भी विशेष महत्व है और लोग बेहद आनंद एवं उल्लास के साथ पतंगबाजी करते हैं। इस इस तरह पूजा, दान, पतंग बाजी, खेल के हर्षोल्लास संग संक्रांति महापर्व उत्सव नए वर्ष के लिए जन में नव ऊर्जा प्रदान करती है।

परिचय- डॉ.आशा गुप्ता का लेखन में उपनाम-श्रेया है। आपकी जन्म तिथि २४ जून तथा जन्म स्थान-अहमदनगर (महाराष्ट्र)है। पितृ स्थान वाशिंदा-वाराणसी(उत्तर प्रदेश) है। वर्तमान में आप जमशेदपुर (झारखण्ड) में निवासरत हैं। डॉ.आशा की शिक्षा-एमबीबीएस,डीजीओ सहित डी फैमिली मेडिसिन एवं एफआईपीएस है। सम्प्रति से आप स्त्री रोग विशेषज्ञ होकर जमशेदपुर के अस्पताल में कार्यरत हैं। चिकित्सकीय पेशे के जरिए सामाजिक सेवा तो लेखनी द्वारा साहित्यिक सेवा में सक्रिय हैं। आप हिंदी,अंग्रेजी व भोजपुरी में भी काव्य,लघुकथा,स्वास्थ्य संबंधी लेख,संस्मरण लिखती हैं तो कथक नृत्य के अलावा संगीत में भी रुचि है। हिंदी,भोजपुरी और अंग्रेजी भाषा की अनुभवी डॉ.गुप्ता का काव्य संकलन-‘आशा की किरण’ और ‘आशा का आकाश’ प्रकाशित हो चुका है। ऐसे ही विभिन्न काव्य संकलनों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी लेख-कविताओं का लगातार प्रकाशन हुआ है। आप भारत-अमेरिका में कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध होकर पदाधिकारी तथा कई चिकित्सा संस्थानों की व्यावसायिक सदस्य भी हैं। ब्लॉग पर भी अपने भाव व्यक्त करने वाली श्रेया को प्रथम अप्रवासी सम्मलेन(मॉरीशस)में मॉरीशस के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मान,भाषाई सौहार्द सम्मान (बर्मिंघम),साहित्य गौरव व हिंदी गौरव सम्मान(न्यूयार्क) सहित विद्योत्मा सम्मान(अ.भा. कवियित्री सम्मेलन)तथा ‘कविरत्न’ उपाधि (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ) प्रमुख रुप से प्राप्त हैं। मॉरीशस ब्रॉड कॉरपोरेशन द्वारा आपकी रचना का प्रसारण किया गया है। विभिन्न मंचों पर काव्य पाठ में भी आप सक्रिय हैं। लेखन के उद्देश्य पर आपका मानना है कि-मातृभाषा हिंदी हृदय में वास करती है,इसलिए लोगों से जुड़ने-समझने के लिए हिंदी उत्तम माध्यम है। बालपन से ही प्रसिद्ध कवि-कवियित्रियों- साहित्यकारों को देखने-सुनने का सौभाग्य मिला तो समझा कि शब्दों में बहुत ही शक्ति होती है। अपनी भावनाओं व सोच को शब्दों में पिरोकर आत्मिक सुख तो पाना है ही,पर हमारी मातृभाषा व संस्कृति से विदेशी भी आकर्षित होते हैं,इसलिए मातृभाषा की गरिमा देश-विदेश में सुगंध फैलाए,यह कामना भी है