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प्रेमचंद की रचनाओं के केन्द्र में स्वराज,स्वदेशी, स्वशासन-प्रो. शुक्ल

वर्धा (महाराष्ट्र)।

प्रेमचंद अपने वैचारिक लेखन में स्वराज,स्वदेशी,स्वशासन, स्वाधीनता की बात करते हैं। राष्ट्र और समाज की स्वतंत्रता के सिपाही के रूप में अभी प्रेमचंद को विस्तार से देखा जाना जरूरी है। प्रेमचंद का नवजागरण भारतीय दृष्टि से ओतप्रोत है। कलम बंद नहीं होगी,नाम बदल होगी प्रेमचंद का यह संकल्प राजनीतिक और मानसिक पराधीनता से मुक्ति की लड़ाई का प्रतीक है। हिंदी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा के रूप में उभरी थी,इसलिए प्रेमचंद हिंदी को अपने लेखन की भाषा बनाते हैं।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र प्रयागराज की ओर से मुंशी प्रेमचंद की १४१वीं जयंती के अवसर पर शनिवार को ‘प्रेमचंद और स्वतंत्रता आंदोलन’ विषय पर तरंगाधारित राष्ट्रीय परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए विवि के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने यह बात कही।
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्राध्यापक एवं हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय(नई दिल्ली) की निदेशक प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से जागरण का प्रयास किया। प्रेमचंद विषमता मुक्त सामाजिक व्यवस्था चाहते थे। आपने प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना के संवाहक के रूप में प्रेमचंद की साहित्यकार और पत्रकार की दृष्टि को प्रस्तुत किया।
हिमाचल प्रदेश विवि के प्रो. चमनलाल गुप्त ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने जीवन में चारों ओर घटनाओं को घटित होते देखा,अनुभव किया,संवेदना के स्तर पर स्वीकार किया और फिर उसकी प्रतिक्रिया अपने साहित्य और जीवन में दी।
साहित्य विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. अवधेश कुमार शुक्ल ने प्रेमचंद की जीवन दृष्टि पर बात करते हुए उसे आदर्शवादी,यथार्थवादी,भौतिकवादी और आध्यात्मवादी करार दिया। विद्यापीठ के प्रो. कृष्ण कुमार सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेमचंद की रचनाओं की चर्चा की।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी एवं
आधुनिक भाषा विभाग के प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह व प्रति-कुलपति प्रो. हनुमान प्रसाद शुक्ल ने भी प्रेमचंद जी के विविध पक्षों पर बात की।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में डॉ. जगदीश नारायण तिवारी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। स्वागत एवं वक्ताओं का परिचय डॉ. अवन्तिका शुक्ल ने दिया। क्षेत्रीय केन्द्र के अकादमिक निदेशक प्रो. अखिलेश दुबे ने प्रेमचंद के जीवन और साहित्य में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जुड़ाव और गांधी के प्रभाव को रेखांकित करते हुए परिसंवाद की प्रस्तावना रखी।
सह आचार्य डॉ. आशा मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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