बेतुके बोलते अ ‘धीर’ से घायल कांग्रेस

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अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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बिखरी, अनुशासनहीन और मनमर्जी सहित कार्यकर्ताओं से इतर ‘परिवारवाद’ से चलाई जा रही कांग्रेस में बेतुके बोलने वालों की कोई कमी अब तक नहीं हुई है, यह बात कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ‘राष्ट्रपत्नी’ कहकर फिर साबित की है। सत्तासीन प्रमुख दल भाजपा ने इस मामले को तत्काल संसद में जोरदार तरीके से उठा कर कांग्रेस को बचाव के लिए अपने ही नाखून मोड़ने पर विवश कर दिया। राष्ट्रपति के इस अपमान पर संसद व सड़क पर कांग्रेस और उनके नेताओं को देश की प्रथम नागरिक तथा देश से माफी मांगने की भाजपा की मांग को कांग्रेस संगठन ने पूरा तो नहीं किया, पर बस दिखाने भर के लिए श्री चौधरी ने अपनी गलती मान ली, क्योंकि मामला बहुत ही उच्च-राष्ट्रीय और गंभीर था।
अब बात श्री चौधरी के अधीर होने की, तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब उन्होंने संगठन की फजीहत की है। ये पहले भी अक्सर अपने बयानों को लेकर विवादों में रहे हैं। मजे की बात यह है कि भाजपा को घेरने, खुद का कद बढ़ाने व लोकप्रिय होने के चक्कर में अधीर के विवादित बयानों के तीर १०० फीसदी उनको और उनके दल को ही लगे हैं। ऊपर से कमाल यह भी कि, वे माफी और गलती की बात मानकर भी ऐसे कारनामे की भरपाई नहीं कर पाते हैं। राष्ट्रीय राजनीति करने वाले अधीर रंजन ने इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘जहाज में तैराकी करने’ से लेकर राजीव गांधी के ‘बड़ा वृक्ष गिरने…’ तक के अजीब बयान दिए और दल की खूब किरकिरी कराई है।
ताजा मामले में भी हास्यास्पद स्थिति देखिए कि श्री चौधरी ने राष्ट्रपति को ‘राष्ट्रपत्नी’ कह संबोधित किया और भाजपा ने आपत्ति ली तो सोनिया गांधी ने कहा कि अधीर ने माफी मांग ली है, मगर अधीर रंजन बोले-‘कैसी माफी ?’ इससे समझा जा सकता है कि संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर भी किस तालमेल से चलाया जा रहा है!
इस समय तो कम से कम कांग्रेस को श्री चौधरी के इस बयान को लेकर कारवाई करनी ही थी, ताकि कार्यकर्ताओं व नेताओं को अनुशासन का अंदाज लगता, पर ऐसा नहीं हुआ, जबकि जहाज में तैराकी करने वाले बयान पर अधीर रंजन के खिलाफ संसद में विशेषाधिकार नोटिस दिया गया था।
ऐसे ही २०१९ में राष्ट्रपति के अभिभाषण प्रस्ताव के दौरान भी अधीर रंजन की प्रधानमंत्री श्री मोदी को लेकर की गई टिप्पणी पर काफी बवाल मचा था। बाद में श्री चौधरी ने इस पर माफी मांगी थी।
यही नहीं, श्री चौधरी ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ भी कह चुके हैं। इसे २०२२ में राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर श्री चौधरी ने ट्वीट किया था। बाद में हटा दिया था। इस ट्वीट को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के नरसंहार से जोड़ कर देखा गया था। इन्होंने इस बयान पर भी कांग्रेस को दिक्कत में ला दिया था और भाजपा ने कांग्रेस और अधीर रंजन को बुरी तरह से घेरा था।
इसके बाद ‘मोदी सरकार ने ईडी को ‘इडियट’ बना दिया (नेशनल हेराल्ड-मनी लॉन्ड्रिंग मामला)’ यह भी इन्होंने कहा, क्योंकि ईडी की तरफ से हो रही कार्रवाई से यह नाराज थे। इस बयान पर जब भाजपा नेता सुब्रह्मणयम स्वामी ने इनकी फजीहत की, तो यह मौन हो गए। इस दौरान भी संगठन ने कोई कारवाई नहीं की तो श्री चौधरी ने २०१९ में फिर अपनी बुद्धिमानी का भरपूर परिचय देकर इसे जारी रखते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी और ​केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को ‘घुसपैठिया’ कह डाला। इनके इस विवादित बयान पर भी जमकर हंगामा मचा और भाजपा उनसे माफी मांगने की मांग पर अड़ी थी। फिर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ‘निर्बला सीतारमण’ कह गए। इन्होंने संसद में २०१९ में यह विवादित बयान दिया था, पर बाद में मौका समझकर उन्हें बहन बताते हुए माफी मांग ली थी।
इतना हीं नहीं, इन्होंने २०१९ में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक पर भी बड़ा जुबानी हमला कर दिया था। तब श्री मलिक ने पलटवार किया था। संभवतः बिना सोचे और अर्थ जाने बोलने को ‘अधीर’ श्री चौधरी ने ही कश्मीर पर सोनिया गांधी की फजीहत कराई थी। तब से लेकर अब ‘राष्ट्रपत्नी’ कहने वाले श्री चौधरी ने ही कश्मीर के मुद्दे पर कांग्रेस की किरकिरी करा दी थी। इसे भारत का आंतरिक मामला नहीं समझने पर तब भाजपा ने कांग्रेस पर जमकर हमला किया था।
कुल मिलाकर बयानवीर श्री चौधरी बोलने में धीर की बजाए अधीर रहते हैं, और विवाद खड़ा होने के बाद उसकी गंभीरता नहीं समझकर कोई रंज भी नहीं करते हैं। इससे इनकी छवि पर भले ही अधिक असर नहीं पड़े, किन्तु नासमझी के ऐसे बयानों से कांग्रेस की जोरदार थू-थू होना जारी है, साथ ही देश की भी।
ऐसे मामलों में संगठन को राजनीति से अलग रखते हुए कांग्रेस दल को ऐसे बेतुके बनाम विवादित बयानों के बयानवीरों पर निष्पक्षता से कारवाई करना चाहिए, क्योंकि इससे कांग्रेस का नुकसान ही हो रहा है, भला तो बिल्कुल नहीं। और ऐसे प्रमुख नेता, जिनकी जिम्मेदारी विपक्ष से लड़ने एवं मुद्दों पर परास्त करने की है, वे खुद ही नए कार्यकर्ता जैसा व्यवहार करें तो ऐसा अनुशासन और भी आवश्यक हो जाता है। यूँ भी देखा जाए तो देश के सबसे उच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति किसी एक दल के नहीं; सबके होते हैं और देश भी, इसलिए इस पद के प्रति तो वैसे भी फालतू का कुछ बोलना अपनी ही भद पिटवाना है। इस बात को कांग्रेस नेतृत्व को समझना बहुत जरुरी है।

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