डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
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माँ…
घर की चौखट के मुहाने पर,
बैठी…
दूर से ही दिख जाती,
रहबरों को निहारती-बुलाती…
आतुर मन से करती संवाद,
कुछ सुनती, कुछ अपनी सुनाती
युगों-युगों की बात बताती,
घर की दहलीज की बन मालकिन
बड़े ही रौब से इठलाती-मुस्कुराती।
माँ…
घर की चौखट के मुहाने पर,
बैठी…
दूर से ही, दिख जाती…॥
बचपन के दिनों में माँ…
मुझे भी बार-बार सुनाती…लिखाती,
कजरी, सोहर, विवाह के… मंगल-गीत,
पर मैं नहीं सीख पाई…
माँ के कोमल मनोभाव को,
मैं… नहीं चढ़ा पाई, अपनी देह पर…
नृत्य की अभेद्य कोई प्रत्यंचा ?
मैं… नहीं सीख पाई….
हस्तकलाओं में निपुण, माँ की कोई कला
सोंधी मिट्टी से कच्ची दीवारों पर
लेप लगाती, गीत-गाती…।
माँ…
घर की चौखट के मुहाने पर,
बैठी…
दूर से ही, दिख जाती…॥
माँ… ने गढ़ा है मुझे भी,
अपने ही संघर्षों की कस्तूरी से
माँ ने सींचा है मुझे भी…
अपने ही लहू की धूनी से,
भरा है रग-रग में मेरे, अपने…
कंटक भरे राहों के…पूरे रंग-राग,
मैं उतरन हूँ… हाँ उतरन…
माँ की वेदना, संघर्ष और जज़्बातों की,
दर्द से कराहती माँ की जिह्वा
उपेक्षाओं से भीगी माँ की देह,
होती गई दुर्बल जैसे मरू-नेह
खुद को ही पुकारती।
माँ…
घर की चौखट के मुहाने पर,
बैठी…
अब पास से भी नहीं, दिख पाती…।
शत-शत नमन माँ… अभिनंदन,
तेरे चरणों में करूं जग-वंदन॥