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सूनी कलाई का रक्षाबंधन

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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रिश्तों का रक्षा-बंधन (रक्षाबंधन विशेष)….

राखी के मौसम में सूनी कलाई खलती,
जिस बहन का भाई नहीं कोई
जिस भाई की बहन नहीं कोई,
दोनों ही उदास-उदास रहते
याद आती राखी की।

बहन भाई के हाथों में राखी बाँधती,
मिठाई खिलाती,
टीका लगाती, आरती उतारती
भाई जीवनभर रक्षा करने का,
वादा करता अपनी बहन की।

कृष्ण के हाथों में सुदर्शन चक्र से
अँगुली कटती,
द्रौपदी ने अपना आँचल फाड़कर बाँधा
नि:स्वार्थ वचन निभाया कृष्ण ने,
कृष्ण ने भी द्रौपदी की लाज बचाई।

कर्णावती ने हुमायूँ की मदद की राखी से,
हुमायूँ ने भी सेना लेकर
रक्षा करने की ठानी बहन की
राखी बड़े उत्साह से मनाई जाती,
हर घर में खुशियाँ ही खुशियाँ दिखाई देतीं।

हर स्कूल में राखी लड़कियाँ बनातीं,
राखी बनातीं और सैनिक भाइयों के लिए भेजतीं
उनकी कलाई पर भी राखी सजती,
बहनों की याद आती,
रक्षा के लिए हमेशा रहते सीमा पर।

किसी भाई की कलाई सूनी रहे नहीं,
आज डाक से भी भेजी जाती हैं राखियाँ।
इसलिए आज भी किसी की कलाई सूनी रहती नहीं।
मैंने भी डाक से राखी भेजी, अपने भाई के लिए॥