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माँ तो माँ है

संजय जैन 
मुम्बई(महाराष्ट्र)

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‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ स्पर्धा विशेष…………………

हमें इस संसार में लाने वाली एक महिला ही है,जिसके द्वारा हमारा जन्म इस पृथ्वी पर हुआ और उसे हम सब अपनी जननी,माँ,माता और आई आदि अनेक नामों से सम्बोधन करते हैं। उसके ही त्याग-तपस्या के कारण हमारा मूल आधार है। हमें इस संसार में लाने वाली माँ क्या अपने बच्चों का कभी भी बुरा सोच सकती है, परन्तु हम सबके जीवन में कभी- कभी इस तरह के हालात पैदा हो जाते हैं कि हमें उस समय निर्णय करना बहुत ही भारी पड़ जाता है, और हम वो निर्णय लेते हैं जो एकदम से सही होता है। इसी बात को एक छोटी-सी कहानी द्वारा समझाने कि ‘माँ तो आखिर माँ होती है’ का प्रयास किया है। घटना कुछ इस तरह है कि स्वयं की पत्नी की सोने की अंगूठी खो गई और वो बार-बार माँ पर इल्जाम लगाए जा रही थी,कि मेरी अंगूठी इन्होंने उठाई है। पति बार-बार उसको अपनी हद में रहने को कह रहा था और बोल रहा था कि माँ ये काम कर ही नहीं सकती,लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी। जोर- जोर से चीख-चीखकर कह रही थी कि-“उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी,और तुम्हारे और मेरे अलावा इस कमरे में कोई नहीं आया। अंगूठी हो ना हो,माँजी ने ही उठाई है।” पति के बार-बार समझने के बाद भी पत्नी मानने को तैयार नहीं। बात जब पति के बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे मारा। अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी,इसलिए पत्नी से तमाचा सहन नहीं हुआ। वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते-जाते पति से एक सवाल पूछा कि-“तुमको अपनी मां पर इतना विश्वास क्यूं है..?”
तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब को दरवाजे के पीछे खड़ी माँ ने सुना तो उसका मन भर आया। पति ने पत्नी को बताया कि-“जब वह छोटा था तब पिताजी गुजर गए। तब माँ मोहल्ले के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाकर जो कमा पाती थी,उससे एक वक्त का खाना आता था। माँ एक थाली में मुझे परोस देती थी और खाली डिब्बे को ढंक कर रख देती थी। कहती थी मेरी रोटियां इस डिब्बे में है,बेटा तू खा ले। मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था,कि माँ मेरा पेट भर गया है। मुझे और नहीं खाना है। माँ ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर पाला-पोसा और बड़ा किया है। आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूँ, लेकिन यह कैसे भूल सकता हूँ कि माँ ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है। वह माँ आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी की भूखी होगी….। यह मैं सोच भी नहीं सकता,तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो,मैंने तो माँ की तपस्या को पिछले पच्चीस वर्षों से देखा है…।” यह सुनकर माँ की आँखों से आँसू छलक उठे। वह समझ नहीं पा रही थी कि बेटा उसकी आधी रोटी का कर्ज चुका रहा है,या वह बेटे की आधी रोटी का कर्ज…कैसे चुका पाएगी,ये सोच रही है। दोस्तों,माँ जिस बच्चे को जन्म देती है,वो कितनी भी बुरी क्यों न हो परन्तु अपने बच्चों के प्रति सदा ही समर्पित भाव रखती है। इस दुनिया में सब-कुछ मिल जायेगा,परन्तु माँ को यदि एक बार खो दिया तो फिर पूरे जीवन नहीं पा सकते हो। हमें महिलाओं का आदर-सम्मान करना चाहिए,तो आइए हम सब इस महिला दिवस पर संकल्प लें कि सदा ही महिलाओं को पूरा सम्मान देंगे,चाहे वो किसी भी रूप में हो।

परिचय-संजय जैन बीना (जिला सागर, मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं। वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। आपकी जन्म तारीख १९ नवम्बर १९६५ और जन्मस्थल भी बीना ही है। करीब २५ साल से बम्बई में निजी संस्थान में व्यवसायिक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। आपकी शिक्षा वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ ही निर्यात प्रबंधन की भी शैक्षणिक योग्यता है। संजय जैन को बचपन से ही लिखना-पढ़ने का बहुत शौक था,इसलिए लेखन में सक्रिय हैं। आपकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। अपनी लेखनी का कमाल कई मंचों पर भी दिखाने के करण कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इनको सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के एक प्रसिद्ध अखबार में ब्लॉग भी लिखते हैं। लिखने के शौक के कारण आप सामाजिक गतिविधियों और संस्थाओं में भी हमेशा सक्रिय हैं। लिखने का उद्देश्य मन का शौक और हिंदी को प्रचारित करना है।