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मैं जीत गई

डॉ.मधु आंधीवाल
अलीगढ़(उत्तर प्रदेश)
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आज मिश्रा जी के घर में फिर हलचल दिखाई दे रही थी । हर चार-पांच महीन बाद ऐसा माहौल रहता,फिर शान्त हो जाता । मेरे पड़ोसी थे। अच्छे व्यवहारिक लोग थे। उनकी बड़ी बेटी सलोनी बहुत ही होशियार व समझदार बच्ची थी। मेरी अच्छी छोटी दोस्त भी,बस उसमें एक ही कमी थी कि उसका रंग काला और शरीर थोड़ा बेडौल पर बुद्धिमानी कुछ ईश्वर ने अधिक ही दी थी। पहले भी कुछ जगह बात हुई,पर जैसे ही सलोनी को देखते तब कहते-लड़की पसंद नहीं है। आज फिर लड़के वाले उसे देखने आ रहे थे ।
सलोनी मेरे पास आई। बहुत सुस्त थी,बोली- ‘दीदी,माँ पापा क्यों नहीं सुनते मेरी क्योंकि जो लोग देखने आ रहे हैं पैसे वाले लोग हैं ।
जतिन भी अधिक पढ़ा हुआ नहीं था पर बहुत स्मार्ट था। खूब शौकीन मिजाज क्योंकि पैसे की कमी नहीं थी । शायद किसी कारणवश उसकी शादी नहीं हो पा रही थी।
मैने उसे समझाया-‘बड़े लोग हैं,बहुत जलने वाले होते हैं लगा देते होगे कोई अड़ंगा।’
वह लोग आए और सम्बन्ध पक्का हो गया। सब बहुत खुश थे पर सलोनी के चेहरे पर खुशी नहीं थी। अभी उसकी प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम आने को रह गए थे। शादी हो गई और वह ससुराल आ गई। सब रिश्तेदार इस बेमेल जोड़ी को देखकर मुस्कुरा रहे थे। आज मिलन की रात का सलोनी इन्तजार कर रही थी,पर जतिन का कोई अता-पता नहीं। जब रात को आया,तो नशे में डूबा हुआ और साथ में सुन्दर-सी कन्या। आते ही बोला-,’सुनो तुम बाहर जाकर सो जाओ। ये मेरी दोस्त है।
सलोनी इस परिस्थिति को तैयार नहीं थी। वह रोती हुई बाहर आ गई। सुबह उसने जब सास जी से कहा,तब वह उल्टा जतिन का पक्ष लेने लगी और बोली,-‘चुप रहकर इस घर में रहना होगा।’
सलोनी पढ़ी-लिखी लड़की थी। उसने मन में सोच लिया ये पत्थर दिल लोग पैसे के नशे में डूबे हुए हैं ये मेरी व्यथा नहीं समझेंगे। वह शान्त रह कर अपनी परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगी। १५ दिन बाद उसका परिणाम आ गया और उसकी नियुक्ति महाविद्यालय के प्राचार्य के पद हॊ गई।
वह मायेके आ गई और दोबारा ना जाने का फैसला कर लिया। सलोनी के मम्मी-पापा भी कुछ नहीं कर पाए। अब वह अपने महाविद्यालय में व्यस्त हो गई। समय बीतता गया । सलोनी ने महाविद्यालय की ख्याति में चार चांद लगा दिए थे। उधर जतिन का व्यापार भी आर्थिक रूप से हानि झेल रहा था। आज एक बहुत बड़ा कार्यक्रम था, जिसमें सलोनी को व उसके महाविद्यालय को पुरस्कृत किया जाना था। शहर के सभी गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। जतिन को यह पता था कि सलोनी ही उस महाविद्यालय की प्राचार्य है,क्योंकि सलोनी ने तलाक के बाद अपना एक सीमित दायरा कर लिया था। वह बहुत कम लोगो से मिलती थी । जैसे ही मंच पर नाम बोला गया कि,जिस कालिज का आज प्रदेश में प्रथम स्थान पर चयन हुआ है, उसका सारा श्रेय जाता हैं उसकी प्रिसींपल आदरणीया सलोनी जी को,वह मंच पर आए। सलोनी को देखकर जतिन अचम्भित हो गया।था, क्योंकि राज्यपाल द्वारा उसका सम्मान हो रहा था। सलोनी ने एक उचटती निगाह जतिन पर डाली,जैसे कह रही हो-‘देखो आज मै असुन्दर हो कर भी जीत गई,तुम हार गए।’

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