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मैं हूँ तो वही

सच्चिदानंद किरण
भागलपुर (बिहार)
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ना मुझे है परवाह कि, जा खिलूं उपवन की,
डाली-डाली और ना, माली संग यूँ गले लगूं।

जी लूं क्यूं न मैं अपनी, बेवफाई में यूँ सबकी,
जिंदगी चलते रूहनाई, में जब-जब गीत गाऊं।

इच्छाओं की अनंतस्था में कभी यूँ ना उकताऊं,
राही चलें सुकर्म-धर्म की, राहों पे तो मैं यूँ संभलूं।

ना कोई मुझसे जा रूठे, इस कर्मवीर कर्म-भूमि,
रण-क्षेत्र का कौशलतम, कर्तव्यनिष्ठ पाठ यूँ पढ़ूं।

भाग्य नहीं कर्मांक्षु बनके, स्वयं को कार्यपथ ढ़ालूं,
ये ही दृढ़ संकल्पता कि, पहचान से सुसेवार्थु बनूं।

तन-मन के इरादों में ये ही राग रमे घर-परिवार,
राष्ट्र-हित अन्यंत्र सेवार्थी, सज्जन‌ता से जा के मिलूं।

आस्था श्रद्धा नमन करूं, देवस्य पूजन के धर्मार्थ में,
अंग-प्रत्यंग पुलकित होते, जब सहज सजग हो जगूं।

आलस्य भय द्वंद-द्वैष को, दूर्क्षित कर अमन चैन का,
स्वाभिमानी के संचयन में, जितना चल सुज्ञान पाऊं।

हम हम ना रहें मन बढ़ावे, नमन करूं!! शीश झुकाते,
सदा निश्चल निस्वार्थी बन, दीन-दुखियों काम आऊं।

कब कहां मिलूं! मिलूं भी, तो वहीं मिलूं जहां प्रभु हैं,
साक्षात् खड़े रक्षा हेतु मेरी, तो वहीं संत धर्म निभाऊं।

‘मैं हूँ तो वही हूँ’ जो आते, सबके काम सबके हैं नाम,
अंत हो मृत्यु-मोक्ष सफल, जनजागृति में लग जाऊं॥

परिचय- सच्चिदानंद साह का साहित्यिक नाम ‘सच्चिदानंद किरण’ है। जन्म ६ फरवरी १९५९ को ग्राम-पैन (भागलपुर) में हुआ है। बिहार वासी श्री साह ने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की है। आपके साहित्यिक खाते में प्रकाशित पुस्तकों में ‘पंछी आकाश के’, ‘रवि की छवि’ व ‘चंद्रमुखी’ (कविता संग्रह) है। सम्मान में रेलवे मालदा मंडल से राजभाषा से २ सम्मान, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ (२०१८) से ‘कवि शिरोमणि’, २०१९ में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ प्रादेशिक शाखा मुंबई से ‘साहित्य रत्न’, २०२० में अंतर्राष्ट्रीय तथागत सृजन सम्मान सहित हिंदी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया कैलाश झा किंकर स्मृति सम्मान, तुलसी साहित्य अकादमी (भोपाल) से तुलसी सम्मान, २०२१ में गोरक्ष शक्तिधाम सेवार्थ फाउंडेशन (उज्जैन) से ‘काव्य भूषण’ आदि सम्मान मिले हैं। उपलब्धि देखें तो चित्रकारी करते हैं। आप विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ केंद्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही तुलसी साहित्य अकादमी के जिलाध्यक्ष एवं कई साहित्यिक मंच से सक्रियता से जुड़े हुए हैं।

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