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राष्ट्र,राष्ट्रीयता और राष्ट्रभाषा हिन्दी

प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी
दिल्ली

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राष्ट्रभाषा को समझने से पहले राष्ट्र और राष्ट्रीयता शब्दों को समझना असमीचीन न होगा और राष्ट्र को समझने के लिए देश और जाति की अवधारणा को समझना आवश्यक है। राष्ट्र,राष्ट्रवाद तथा राष्ट्रीयता भी एक दूसरे में अंतर्ग्रंथित हैं,जो किसी देश की भाषा और संस्कृति को स्पष्ट करने में सहायक होते हैं। वस्तुत: ‘राष्ट्र’ शब्द को अंग्रेज़ी भाषा के ‘नेशन’ शब्द का हिन्दी पर्याय माना जाता है,किंतु ऐसा है नहीं। इन दोनों शब्दों में कुछ अंतर है। अंग्रेज़ी में ‘नेशन‘ शब्द से अभिप्राय किसी विशेष भूमि-खंड में रहने वाले निवासियों से है, जबकि ‘राष्ट्र’ शब्द विशेष भूमि-खंड,उसमें रहने वाले निवासी और उनकी संस्कृति का बोध कराता है। भौगोलिक रूप से और राजनीतिक दृष्टि से एक विशेष भूमि-खंड को ‘देश’ की संज्ञा दी जाती है,किंतु इसका संबंध मानव समुदाय से नहीं है। मानव समुदाय का संबंध समाज से है और इसका अभिप्राय ‘जाति’ से है। इस मानव समुदाय के सामाजिक विकास के क्रम में सबसे पहले ‘जन’ या ‘गण’ का प्रादुर्भाव होता है। यह गण समाज अर्थात जन समुदाय आर्थिक आधार पर जुड़ कर एक ‘जाति’ का रूप धारण कर लेता है। इस जाति का अपना प्रदेश और अपनी भाषा होती है। यूनान में अनेक गण-राज्य थे जिनमें सामंती व्यवस्था वाली लघु जातियाँ भी थीं। भारत में भरत,कुरु,पांचाल आदि अनेक गण समाज थे। बौद्ध काल के जनपद या महाजनपद लघु जातियों के ही प्रदेश थे,जिनमें मगध,ब्रज,अवध, बुंदेलखंड आदि लघु जातियों वाले अनेक प्रदेश बने,जिनकी अपनी-अपनी भाषा है। व्यापार के विस्तार से विभिन्न लघु जातियाँ अथवा जनपदों में जब आपसी संपर्क बढ़ता है,तो वे जाति का रूप धारण कर लेते हैं। इन्हीं मगध,ब्रज,बुंदेलखंड आदि जनपदों से हिन्दी भाषी जाति का निर्माण हुआ है। इन जनपदों में जब जुड़ाव हो जाता है और अलगाव दूर हो जाता है,तो एक बड़ी सांस्कृतिक इकाई का निर्माण होता है। इसी लिए,हिन्दी विद्वान राम विलास शर्मा ने इस हिन्दी जाति को बड़ी सांस्कृतिक इकाई मानते हुए कहा है कि यही सांस्कृतिक इकाई राष्ट्रीय एकता की धुरी होती है। इसी प्रकार हिन्दी जाति के साथ-साथ मराठी,बंगला,तमिल आदि भाषाएँ बोलने वाली अनेक जातियाँ भी अस्तित्व में आई हैं। कुछ विद्वान बड़ी सांस्कृतिक इकाई जाति को ‘नेशन’ से भी जोड़ते हैं।

राष्ट्र शब्द में व्यापक अर्थ निहित है। अंग्रेज़ी में इसके लिए कोई समानार्थक शब्द नहीं मिलता। इसके अंतर्गत देश और जाति दोनों की संकल्पना निहित है। वैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द का प्रयोग भूमि,जन और संस्कृति के अंतर्ग्रंथित रूप में चला आ रहा है। अथर्ववेद में बताया गया है कि हमारे ऋषियों ने जगत के कल्याण के लिए अपने ज्ञान और ओज से राष्ट्र को उत्पन्न किया-

भद्रम् इच्छन्त ऋषय: स्वर्विद:

तपो दीक्षां उपसेदु: अग्रे।

ततो राष्ट्रम् बलं ओजश्च जायम

तदस्यै देवा उपसंनमन्तु। (अथर्ववेद संहिता)

इस प्रकार अनादि काल से भारत एक संगठित राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में रहा है। वास्तव में राष्ट्र शब्द में तीन संदर्भों का सम्मिलन होता रहा है–पहला,वह भूखंड या भूमि जिसमें मानव समुदाय रहता है,दूसरा,स्वयं मानव समुदाय और तीसरा,उस मानव समुदाय की संस्कृति। मनुस्मृति(१०/६१,७/७३,९/२५४) में राष्ट्र को ज़िला,मंडल,प्रदेश या राज्य,देश या साम्राज्य के साथ-साथ प्रजा,जनता या अधिवासी के अर्थ में परिभाषित किया गया है। इसमें भूमि,जन और उनकी संस्कृति सभी कुछ समाहित है। अपनी जन्मभूमि के प्रति अनन्य प्रेम की अभिव्यक्ति से भी ‘राष्ट्र’ की भावना जन्म लेती है। इसी अभिव्यक्ति को रामायण के रचयिता वाल्मीकि ने रावण वध के बाद राम के मुख से लक्ष्मण को कहलवाया है–

‘अपि स्वर्णमयीलङ्का न में लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’।

अर्थात हे लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका स्वर्णमयी है,फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है,क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान् होते हैं।

विश्व में तीन प्रकार की जातियता वाले राष्ट्र माने गए हैं–एकजातिय,द्विजातिय और बहुजातिय। जापान,ईरान,पोलैंड,रूमानिया आदि देश एकजातिय राष्ट्र हैं। कनाडा,बेल्जियम आदि द्विजातिय राष्ट्र हैं और भारत,ब्रिटेन,अमेरिका,चीन,फ्रांस,जर्मनी आदि अनेक देश बहुजातिय राष्ट्र हैं। हर जाति की अपनी भाषा,अपनी संस्कृति और अपना साहित्य होता है जिनसे राष्ट्रीय संस्कृति का विकास होता है। भारत बहुजातिय,बहुभाषी और बहुधर्मी राष्ट्र है जिसमें तमिल,कन्नड़,तेलुगू,मलयालम,बांग्ला,उड़िया,मराठी,गुजराती,पंजाबी,कश्मीरी आदि कई जातियाँ हैं। इनके केन्द्र में हिन्दी जाति है,जिसके कारण भारत को हिंदुस्तान या हिंदुस्ताँ कहा जाता है और कुछ लोग इसे हिन्दी भी कहते हैं। इसी संदर्भ में उर्दू के एक महान् शायर इकबाल ने अपने कौमी तराना में कहा है–‘’हिन्दी हैं हम वतन है हिंदुस्ताँ हमारा।‘’ इसी दृष्टि से ब्रिटेन में इंग्लिश जाति की बहुलता होने के कारण ही उसे इंग्लैंड भी कहा जाता है। वास्तव में बहुजातिय राष्ट्र से अभिप्राय उस देश से है,जिसमें अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, अनेक जातियों के लोग रहते हैं और उनमें राष्ट्रीय चेतना होती है। राजनीतिक दृष्टि से भारत चाहे कुछ देशों की भाँति राष्ट्र न कहलाता हो,किंतु यूरोप और अफ्रीका महाद्वीपों की भाँति उसका एक भू-भाग ही राष्ट्र है। भारत राष्ट्र की एकता अनेकता और विभिन्नता में निहित है। ऐसी राष्ट्रीय चेतना का विकास भारत में ही हुआ है।

राष्ट्र से राष्ट्र-भावना और राष्ट्र चेतना का उदय होता है। इस राष्ट्र-भावना से राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का जन्म होता है। १८वीं-१९वीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण के बाद राष्ट्रवाद का प्रादुर्भाव हुआ। इसके साथ ही फ्रांस,इटली,ब्रिटेन आदि देशों के राष्ट्रवाद को व्यापारिक पूँजीवाद का परिणाम भी माना गया है। इसी लिए कुछ विद्वान राष्ट्रवाद को व्यापारिक पूँजीवाद की देन मानते हैं। वस्तुत: राष्ट्रवाद की परिभाषा करना सरल नहीं है। इसकी प्रक्रिया भी अत्यंत जटिल और बहुमुखी रही है,इसी लिए इसका कोई सार्वभौमिक सिद्धांत और दर्शन स्पष्ट नहीं हो पाया। इसकी उत्पत्ति राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक और बौद्धिक कारणों से हुई है,जिसको मानने वाले व्यक्तियों का समूह एक ही मन:स्थिति या भावना वाला होता है। यह समूह समान परम्परा,समान रीति-रिवाज,समान धर्म मानता है। इन लोगों का मत है कि राष्ट्र केवल समान धर्म,जाति,नस्ल,क्षेत्र या भाषा से बनता है। इससे तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है और उग्रवाद को बल मिलता है। वास्तव में इस प्रकार के राष्ट्रवाद की अवधारणा को ज़ोर-ज़बरदस्ती से लागू करना एक प्रकार का अतिराष्ट्रवाद अथवा अंधराष्ट्रवाद है। इसी लिए,आज का राष्ट्रवाद राष्ट्र के विकास और संवर्धन में सहायता करने के बजाय बाधाएँ उत्पन्न कर रहा है।

दूसरी ओर,राष्ट्रीयता एक ऐसी शुद्ध भावना है जिसके अंतर्गत अपने राष्ट्र के हित और विकास के बारे में चिंतन-मनन होता है। यह किसी समुदाय की आस्था और अस्मिता की वह प्रक्रिया है,जिसके अंतर्गत उस समुदाय का इतिहास,उसकी परम्परा,संस्कृति,भाषा और जातियता उसके आधार के रूप में समाहित होती हैं। इसका उद्देश्य राष्ट्र की संप्रभुता को बनाए रखना होता है,अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का निर्माण करना होता है,उस पर गर्व करना होता है और उसका अनुरक्षण करना होता है। इसमें बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप वर्जित है। वस्तुत: राष्ट्रीयता की भावना राष्ट्र के लोगों में पाई जाने वाली वह सामुदायिक भावना है,जो उनको संगठित करने और दृढ़ बनाने में मुख्य भूमिका निभाती है। राष्ट्रीयता से राष्ट्र में ऐक्य की भावना पैदा होती है और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए आंतरिक सौहार्द्र एवं सदभावना,देश-भक्ति और संगठन की भावना की आवश्यकता होती है। भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान औपनिवेशिक पराधीनता में और राष्ट्रीयता की प्रेरक भूमिका रही है। यहाँ यह उल्लेख करना असमीचीन न होगा कि,यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास साम्राज्य-विस्तार से जुड़ा है,लेकिन भारत में राष्ट्रीयता स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी थी। यह यूरोप का राष्ट्रवाद नहीं, राष्ट्रीयता थी,लेकिन स्वतंत्रता-प्राप्ति के कुछ वर्ष बाद यह राष्ट्रीयता राजनीति के चक्रव्यूह में फंस कर जाति,धर्म,वर्ण और संप्रदाय के मिथ्या-भेदों में उलझ गई और उसकी सीमाएँ संकुचित,संकीर्ण तथा सीमित हो गईं हैं।

किसी भी राष्ट्र में सर्वाधिक प्रचलित और स्वेच्छा से आत्मसात की गई संपर्क भाषा राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा जीवंत,स्वायत्त,मानक,उन्नत और समृद्ध होती है और वह समूचे राष्ट्र अथवा देश में सार्वजनिक संप्रेषण-व्यवस्था और कार्य-व्यापार में प्रयुक्त होती है। यदि राष्ट्र बहुभाषी हो तो उसमें अंतर-प्रांतीय मध्यवर्तिनी भाषा के रूप में विभिन्न भाषाभाषी समुदायों के बीच बृहत्तर स्तर पर वह संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है। वह केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों में सरकारी कार्यों और पत्र व्यवहार में भी प्रयुक्त होती है। राष्ट्रभाषा का संबंध राष्ट्रीयता से रहता है,क्योंकि राष्ट्रीयता जातिय प्रमाणिकता एवं राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी होती है। राष्ट्रीय चेतना का संबंध सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से होता है। इसका संबंध ‘भूत’ और ‘वर्तमान’ के साथ होता है तथा महान परम्परा के साथ जुड़ा रहता है। वस्तुत: राष्ट्रभाषा राष्ट्र के समाज और संस्कृति के साथ तादात्म्य स्थापित करती है तथा सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा की अभिव्यक्ति के रूप में कार्य करती है। यह भाषा जनता की निजी,सहज और विश्वासमयी भाषा बन जाती है जिसका प्रयोग राष्ट्रपरक कार्यों में चलता रहता है। अमेरिकन भाषाविज्ञानी जोशुआ फिशमैन ने राष्ट्रभाषा के संदर्भ में नेशनेलिज़्म(राष्ट्रीयता) और नेशनिज्म (राष्ट्रता अथवा राष्ट्रिकता) की संकल्पना प्रस्तुत की है। फिशमैन ने राष्ट्रभाषा का संबंध राष्ट्रीयता से जोड़ा और राजभाषा का संबंध राष्ट्रिकता से जोड़ा। राष्ट्रिकता के अंतर्गत राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं के अंतर्गत राष्ट्र की आर्थिक प्रगति,राजनीतिक एकता और प्रशासनिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए काम होता है। इस संदर्भ में कोई भी विकसित और मानक भाषा राजभाषा होती है। यह भाषा सरकारी कामकाज में प्रयुक्त हो कर जनता तथा शासन के बीच संपर्क पैदा करती है। राष्ट्रभाषा में राष्ट्रीय प्रवृतियाँ सन्निहित होती हैं,अपने देश की परम्परा के प्रति प्रेम होता है,राष्ट्र की संस्कृति के प्रति लगाव होता है और राष्ट्र की एकता के प्रति भावनाएँ होती हैं। इसलिए उसका अपने ही देश की भाषा होना अनिवार्य है। राजभाषा के लिए अपने देश की भाषा होना आवश्यक नहीं है। देश के बाहर की भाषा राजभाषा तो हो सकती है,किंतु राष्ट्रभाषा नहीं;जैसे भारत में अंग्रेज़ी राजभाषा का स्थान तो ले सकती है,किंतु राष्ट्रभाषा नहीं। अमेरिका के सुविख्यात विद्वान फर्ग्युसन का मत है कि देश का भाषा नियोजन करते हुए राष्ट्रीय अस्मिता,और राष्ट्रीय एकता के साथ-साथ आधुनिक समाज, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय संबंध में से कम-से-कम तीन लक्ष्यों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। ये विशेषताएँ अपने देश की भाषाओं में ही मिल सकती हैं,विदेशी भाषा में नहीं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रभाषा के संदर्भ में यह कहना भी उचित होगा कि जिस भाषा में राष्ट्र-निष्ठा और राष्ट्रीय भावना नहीं होती,वह राष्ट्रभाषा कहलाने की अधिकारी नहीं होती।

प्रश्न उठता है कि हिन्दी में ऐसी कौन-सी विशेषता है,जिसके कारण उसे राष्ट्रभाषा माना जाना चाहिए। साहित्यिक संदर्भ में हिन्दी का साहित्य समृद्ध और श्रेष्ठ है। विश्व के अनेक विद्वानों ने हिन्दी साहित्य की कविता,उपन्यास,कहानी,नाटक आदि विभिन्न विधाओं की कृतियों का न केवल अनुवाद किया है बल्कि उन पर शोध और आलोचनात्मक कार्य भी किया है। संस्कृत,तमिल,बंगला, मराठी,गुजराती,कन्नड़,तेलुगु,उड़िया आदि भारतीय भाषाओं के समान हिन्दी समृद्ध और जीवंत भाषा तो है ही,साथ ही इसके बोलने वालों की संख्या अन्य भाषाओं की अपेक्षा काफी अधिक है। यह केवल राष्ट्रीय स्तर पर बोली नहीं जाती,बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सर्वाधिक बहुसंख्यक भाषाओं में गिनी जाती है। यही कारण था जिससे इसको भारतीय संविधान में संघ की राजभाषा के पद पर सुशोभित किया गया। वास्तव में हिन्दी अब न तो किसी क्षेत्र-विशेष की भाषा है,और न ही किसी एक समुदाय की मातृभाषा। वह तो जन-जन की भाषा हो गई है। वह महाजनपद की भाषा है,पूरे राष्ट्र की भाषा है। समय-समय पर इसके स्वरूप में जो परिवर्तन होते रहे हैं,उनमें वह अपने मानस में विभिन्न भाषाओं और बोलियों के तत्त्वों को संजोती रही है। यह एक ऐसी अजस्र प्रवाहिनी गंगा नदी के समान है,जो अन्य भाषाओं एवं बोली रूपी नदियों के सम्मिलन से एक विस्तृत,व्यापक और सुंदर स्रोतस्विनी का रूप धारण करती रही है। हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं,अपितु हमारी राष्ट्रीयता है। हमारे जातिय गौरव का प्रतीक है और भारत अर्थात हिंदुस्तान की पहचान है। इसने लोकभाषा खड़ी बोली का आधार ले कर और अन्य बोलियों से सिंचित हो कर भाषा का रूप धारण किया और फिर पूरे भारत की संपर्क भाषा बनी और फिर राजभाषा से गौरवान्वित हुई। राजभाषा से राष्ट्र भाषा का स्वरूप ग्रहण कर लिया और फिर अपने बढ़ते हुए विकास की यात्रा में यह राष्ट्रभाषा इतनी गतिशील हो गई है कि विश्व भाषा का स्थान लेने में अग्रसर हो गई। इसी लिए,राष्ट्रीयता की भावना से अनुस्यूत राष्ट्रभाषा दो लक्षणों-आंतरिक एकता और बाह्य विशिष्टता से परस्पर गुंथी होती है। समूचे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने की प्रवृति आंतरिक एकता होती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाह्य रूप में विशिष्टता सिद्ध करने की प्रवृति होती है। बहुभाषी देश में आंतरिक एकता तभी संभव है,जब मातृभाषा के साथ-साथ एक अन्य भाषा संपर्क भाषा के रूप में उभर कर आए और बाह्य विशिष्टता के लिए यह भी आवश्यक है कि संपर्क भाषा के रूप में राजभाषा की पदवी पाने वाली वह भाषा स्वदेशी ही हो। ये दोनों लक्षण हिन्दी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बना देते हैं। इसी कारण हिन्दी को स्वतंत्रता-संग्राम के समय से राष्ट्रभाषा का पद देने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

समूचे देश की संपर्क भाषा होने के कारण स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान हिन्दी की प्रासंगिकता को समझा गया और राष्ट्रभाषा की अवधारणा ने जन्म लिया। न केवल हिन्दीभाषी संतों और आचार्यों ने जन-जन के हृदय तक हिन्दी में अपना संदेश पहुँचाने का कार्य किया,बल्कि दक्षिण और हिंदीतर-भाषी आचार्यों और संतों का भी विशेष योगदान रहा है। दक्षिण के रामानुज, रामानंद,विट्ठल,वल्लभाचार्य,महाराष्ट्र के नामदेव एवं ज्ञानेश्वर,गुजरात के नरसी मेहता तथा स्वामी दयानंद,असम के शंकर देव,पंजाब के गुरु नानक देव आदि आचार्यों और संतों ने देश में जन-जन तक अपना संदेश पहुँचाने और अपने ज्ञान का प्रसार करने के लिए हिन्दी को अपना माध्यम बनाया। हिन्दी की इस सरलता,सहजता और सर्वदेशिकता के परिप्रेक्ष्य में काका कालेलकर ने कहा था कि-‘’हिन्दी सिद्धों की भाषा है,संतों की भाषा है और साधारण जन की भाषा है,जिसकी सरलता,सुगमता,सुघड़ता और अमरता स्वयं-सिद्ध है। हिन्दी उत्तर से दक्षिण तक जोड़ने वाली सबसे बड़ी कड़ी है।‘’ एक विदेशी अनुसंधानकर्ता एच.डी. कोलबुक ने एक सौ वर्ष पूर्व ‘एशियाटिक रिसर्च’ में लिखा था कि-‘’जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रांत के लोग करते हैं,जो पढ़े-लिखे और अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है और जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े-बहुत लोग समझ लेते हैं,उसी का यथार्थ नाम हिन्दी है।’’

एक शोध से जानकारी मिली है कि,मुग़ल काल से पूर्व भी मुस्लिम राज्यों में शाही फरमानों में हिन्दी का प्रयोग होता था। यद्यपि मुग़ल काल में फारसी राजभाषा हो गई थी,किंतु यत्र-तत्र हिन्दी का भी प्रयोग होता था। एक शोधकर्ता बुलाखमैन ने सन् १८७१ में ‘कलकत्ता रिव्यू’ में लिखा था,-‘’मुग़ल बादशाहों के शासन काल में ही नहीं,इससे पहले भी सभी सरकारी कागजात हिन्दी में लिखे जाते थे।‘’ स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान बंगाल,गुजरात,महाराष्ट्र,पंजाब,दक्षिण भारत आदि हिंदीतर भाषी राज्यों के नेताओं,राजनेताओं,साहित्यकारों और समाज सुधारकों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की माँग की। इनमें राजा राममोहन राय,केशवचंद्र सेन,सुभाषचंद्र बोस,स्वामी दयानंद,सरदार वल्लभ पटेल, लोकमान्य तिलक,लाला लाजपत राय,सुब्रह्मण्यम भारती आदि उल्लेखनीय हैं। सन् १९१० में हिंदीतर भाषी न्यायमूर्ति शारदा चरण मित्र ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय को शुभ संदेश भेजते हुए लिखा था-“हिन्दी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। यद्यपि मैं बंगाली हूँ,तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन सारे भारतवासियों के साथ साधु हिन्दी में वार्तालाप कर सकूँ।” भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के महानायक गुजराती-भाषी महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता की लड़ाई में हिन्दी के महत्व को समझ लिया था और समूचे देश के जन-मानस में उसे राष्ट्रभाषा बनाने की भावना को देखते हुए हिंदीतर भाषी राज्यों में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों का जाल बिछा दिया। वास्तव में यह एक मनोसामाजिक यथार्थ था।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारतीय राजनेताओं ने देश में बहुभाषिकता की वास्तविकता को समझा,उसे एक सूत्र में बाँधने और राष्ट्रीय विकास में हिन्दी की महता को पहचाना और फिर संविधान में राजभाषा का दर्जा दे कर उसे गौरवान्वित किया। मुंशी-आयंगर फार्मूले के नाम से विख्यात संविधान का भाग १७ है जिसमें ३४३ से ३५१ तक अनुच्छेद हैं और साथ में संविधान के परिशिष्ट में अष्टम अनुसूची। इस अवसर पर संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बड़ी मार्मिकता से कहा था कि-“आज पहली बार हम अपने संविधान में एक भाषा स्वीकार कर रहे हैं,जो भारत संघ के प्रशासन की भाषा होगी। हमें समय के अनुसार अपने-आपको ढालना और विकसित करना होगा। हमने अपने देश का राजनीतिक एकीकरण किया है। राजभाषा हिन्दी देश की एकता को कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिक सुदृढ़ बना सकेगी। अंग्रेज़ी की जगह भारतीय भाषा को स्थापित करने से हम निश्चय ही और भी एक-दूसरे के नजदीक आएँगे।“

राजभाषा का उत्तरदायित्व ग्रहण करने के लिए हिन्दी को सक्षम माना गया। अत: संविधान के अनुच्छेद ३४३ में देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया। यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दी का यह संविधानीकरण करना हिन्दी का राष्ट्रीयकरण करना ही है। इसमें हिन्दी को अखिल भारतीय रूप में देखा गया है जिससे राष्ट्रीय विकास की संभावनाओं में वृद्धि होती है। यह केवल प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा नहीं है,बल्कि राष्ट्रभाषा की भूमिका भी निभा रही है। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने तो उन लोगों की इस बात से कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना है,इन्कार करते हुए कहा है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है,यह तो पहले से ही राष्ट्रभाषा है। यह सांस्कृतिक जागरण और भारतीय एकता का आधार है। यदि राष्ट्र की संकल्पना समूचे भारतवर्ष पर लागू हो जाए तो हिन्दी सामाजिक और भावात्मक एकता के लिए राष्ट्रभाषा का कार्य कर सकती है और यदि भारत राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों का संघ या समूह माना जाए तो अन्य भारतीय भाषाएँ राष्ट्रभाषा के रूप में कार्य करेंगी,लेकिन यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि संविधान में स्पष्ट रूप से हिन्दी को राष्ट्रभाषा क्यों नहीं मान लिया गया,जबकि प्रतीक के रूप में राष्ट्र का एक ध्वज,एक गान,एक पक्षी,एक पशु और एक पुष्प निर्धारित हो सकता है तो एक भाषा क्यों नहीं। यह सही है कि बहुभाषी देश में हर भाषा अपने समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक मनोगत अस्मिता से जुड़ी होती है,लेकिन यह भी सत्य है कि देश की राष्ट्रीय अस्मिता,अखंडता और एकीकरण के साथ-साथ हिन्दी के प्रति जन मानस की भावना को भी समझना होगा। हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित करने का यह अभिप्राय नहीं है कि यह भाषा अन्य भारतीय भाषाओं की अपेक्षा अधिक समृद्ध है। इसे बोलने और समझने वाले लोगों की संख्या न केवल देश में सबसे अधिक है,बल्कि विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली तीन भाषाओं में से एक है। इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि इसके राष्ट्र भाषा बन जाने से अन्य भारतीय भाषाओं का महत्व कम हो जाएगा। हिन्दी अगर राष्ट्रभाषा बन जाती है तो अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान और भूमिका में भी वृद्धि होगी और ये भाषाएँ हिन्दी की सहयोगी भाषा के रूप में महत्वपूर्ण योगदान करती रहेंगी।

संविधान में हिन्दी संबंधी भाषायी अनुच्छेदों में अनुच्छेद ३५१ सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपबंध है,जिसमें कहा गया है कि-“संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए,उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप,शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक हो,वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।“ इस अनुच्छेद का लक्ष्य हिन्दी को केवल संघ की राजभाषा के स्वरूप के नियोजन तक सीमित नहीं रखना है,वरन् भाषा-व्यवहार के विविध आयामों एवं क्षेत्रों में हिन्दी के भारत-व्यापी व्यवहार-क्षेत्र से जोड़ना है। हिन्दी के राष्ट्रीय स्वरूप का विकास करने के लिए यह अनुच्छेद संविधान-निर्माताओं की आंतरिक आकांक्षा को व्यक्त करता है, ताकि यह देश के सभी भाषायी वर्गों में स्वीकार्य हो सके। इसमें हिन्दी को विकसित करने और समृद्ध बनाने की ज़िम्मेदारी संघ सरकार को दी गई है। इसका स्वरूप समन्वित और उदार हो। भारत की सभी संस्कृतियाँ मिली-जुली हों,उनमें पूर्ण समन्वय हो,जिससे विभिन्न क्षेत्रीय भाषा-समूह यह अनुभव कर सकें कि राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में यह विकसित भाषा उनकी अपनी भाषा के निकट है और इस भाषा के निर्माण में उनका योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस प्रकार संविधान-निर्माताओं ने भविष्य के लिए ‘राष्ट्रीय हिन्दी’ की कल्पना की थी। हिन्दी का यह संविधानीकरण हिन्दी के राष्ट्रीयकरण और उसके अखिल स्वरूप का तर्कपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है। इसी लिए,हिन्दी की परिभाषा सांगोपांग और उदार निर्धारित की गई है। यथा-

-यह भारत की सामासिक संस्कृति अर्थात मिली-जुली संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बने। दूसरे शब्दों में,किसी एक ही समुदाय की संस्कृति की वाहिका न बने।

-यह अपनी प्रकृति खोए बिना हिंदुस्तानी और आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं के रूप,शैली और पदों को आत्मसात करे,अर्थात क्षेत्रीय भाषाएँ राजभाषा हिन्दी की पोषक बने।

-यदि आवश्यकता पड़ती है तो यह अपने विकास के लिए संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द ग्रहण कर सकती है।

हिन्दी भारत की लगभग सभी भारतीय भाषाओं के शब्द,शैली आदि अपना कर विकसित हो गई है,लेकिन इन भारतीय भाषाओं के प्रभाव से विकसित हिन्दी का स्वरूप कृत्रिम नहीं है,बल्कि इसने सार्वदेशिक रूप ग्रहण कर लिया है। यह भाषा-समाज की सांस्कृतिक अवधारणाओं और आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह धर्म-निरपेक्ष भाषा है और इसी कारण यह सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुकी है। भारतीय संस्कृति अपने-आप में सामासिक और मिली-जुली है। इसकी विभिन्न उपसंस्कृतियों के एक-दूसरे के बहुत निकट होने के कारण इनकी अलग से पहचान करना कठिन हो जाता है। तथापि,इनमें पारस्परिक आदान-प्रदान है जिससे हिन्दी अपनी समन्वयवादी भूमिका भली-भाँति निभा रही है। वस्तुत: हिन्दी के इस राष्ट्रीय विकास से ही तभी संभव हो पाएगा,जब इसका व्यापक प्रयोग सभी क्षेत्रों में हो और समूचे देश के राष्ट्रीय जीवन में अधिक व्याप्त हो।

संविधान के अनुच्छेद ३४३ खंड (३) के अधीन राजभाषा अधिनियम १९६३ को लोकसभा में तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने १३ अप्रैल १९६३ को प्रस्तुत किया था। इसका उद्देश्य था कि १५ वर्ष की अवधि(२६ जनवरी १९६५) के बाद हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग जारी रखने के लिए संसद को कानून बनाने का अधिकार दिया जाए। इस विधेयक पर अपना वक्तव्य देते हुए गृह मंत्री ने यह भी कहा कि-“हम अंग्रेज़ी की वर्तमान स्थिति कायम नहीं रख सकते और न ही रहनी चाहिए। कोई राष्ट्रीय औचित्य न हो तब तक अंग्रेज़ी के स्थान पर और देश की अन्य राष्ट्रीय भाषाओं को अपनाने में अनिश्चितता बनाए रखना भी उपयुक्त नहीं है। अनंत काल तक अंग्रेज़ी की वर्तमान स्थिति चलने नहीं दी जा सकती।” काफी लंबे वाद-विवाद के बाद यह विधेयक पारित हुआ और १० मई १९६३ को उस पर हस्ताक्षर हुए।

इस प्रकार भारत की बहुभाषिक स्थिति होते हुए भी हिन्दी के प्रयोग की संभावनाएँ अधिक थीं,किंतु भारत संघ की यह राजभाषा कार्यालयीन भाषा तक सीमित रह गई है। एक विडंबना और,न्यायपालिका में और वह भी हिन्दी भाषी राज्यों में इसका प्रयोग आज भी अत्यल्प हो रहा है,उच्चतम न्यायालय में तो बिलकुल ही नहीं। विज्ञान,प्रौद्योगिकी,वाणिज्य-व्यापार,शिक्षा(विशेषकर उच्च शिक्षा) आदि अनेक क्षेत्रों में अंग्रेज़ी का वर्चस्व है। वास्तव में संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा देते हुए हमारे भाषा नियोजन में कुछ कमी रह गई, जिसके कारण इसकी सामाजिक-सांस्कृतिक एकता की अवधारणा को प्रशासनिक प्रयोजनों तक सीमित कर दिया गया। दूसरा,शासन तंत्र की सुविधा के लिए अंग्रेज़ी को अनिश्चितकाल तक जारी रख देश में द्विभाषिक स्थिति पैदा कर दी गई है। इससे हिन्दी की स्थिति नाज़ुक और जटिल बन गई है। तथापि,हिन्दी अपनी सार्वदेशिक प्रकृति के कारण समूचे भारत की संपर्क भाषा की भूमिका निभा रही है और देश की सामासिक संस्कृति को अभिव्यक्त करने में सक्षम भी है।

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश स्व. गोपाल राव एकबोटे ने सन् १९८० में ए नेशन विदाउट अ नेशनल लैंगवेज़ के नाम से पुस्तिका का प्रकाशन किया था। बाद में उन्होंने इस पुस्तिका में और सामग्री जोड़ी और आचार्य खंडेराव कुलकर्णी के सहयोग से इस परिवर्द्धित पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद कर ‘राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र’ पुस्तक का प्रकाशन सन् १९८७ में किया। बहुभाषी भारत में हिन्दी को राष्ट्रीय एकात्मकता का निर्माण करने की शक्ति और महत्ता का विवेचन करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी एक समन्वयवादी और उदार भाषा है। इसके विकास में इसकी अपनी बोलियों,भारतीय भाषाओं और अन्य वैश्विक भाषाओं का विशेष योगदान है। स्वतंत्रता-संग्राम से चली आ रही भावनात्मक पृष्ठभूमि है। एकबोटे जी ने यह भी उल्लेख किया है कि संविधान के अनुछेद ३५१ में इसके स्वरूप का विवेचन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि,यह हिन्दी उत्तर प्रदेश,बिहार,मध्य प्रदेश,राजस्थान आदि हिन्दीभाषी क्षेत्रों की भाषा हिन्दी से अलग हो गई है। इसलिए,इसे राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलना ही चाहिए। भारत का भाषिक भारतीयकरण का स्वावलंबन और भाषा नीति भारतीय जनता की राष्ट्रीय आकांक्षाओं और राजकीय प्रयोजनों के अनुरूप होना ज़रूरी है। यदि हिन्दी को पूर्ण रूप से राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं मिला तो भारत के विकास और प्रगति की संभावना करना व्यर्थ हो जाएगा।

भारत का स्वतंत्रता-संग्राम हमारे संघर्षों का इतिहास है। आज़ादी की लड़ाई में हिन्दी की विशेष भूमिका रही है और इसी लिए महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्र की भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए एक जनभाषा का होना आवश्यक है। यह भूमिका केवल हिन्दी या हिंदुस्तानी ही निभा सकती है। गांधी जी हिन्दी और हिंदुस्तानी में कोई अंतर नहीं मानते थे। इसी लिए हिन्दी न केवल स्वतंत्रता-सेनानियों की राष्ट्र भाषा थी,अपितु समस्त जनता ने अपने समूचे स्वतंत्रता-संग्राम में इसे राष्ट्रभाषा ही माना हुआ था। सच मानिए,उस काल में हिन्दी ही राष्ट्रभाषा थी। सन् १९०६ से सन् १९४७ तक अर्थात देश के स्वतंत्र होने तक भारत के हर देशवासी की अभिलाषा थी कि भारत की राष्ट्रीय एकात्माकता के लिए और उसे शक्तिशाली बनाने के लिए एक राष्ट्र-ध्वज,एक राष्ट्रगीत के साथ-साथ एक राष्ट्रभाषा का होना नितांत आवश्यक है। इसी संघर्ष,इन्हीं जन-आकांक्षाओं और भावनाओं का सुफल है संविधान का अनुच्छेद ३५१। इस अनुच्छेद के पीछे अगर इस महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि को भुला दिया गया तो इसकी सार्थकता और प्रयोजनीयता समाप्त हो जाएगी। इस प्रकार अनुच्छेद ३५१ से यह आशय निकलता है कि संविधान-निर्माता हिन्दी को मात्र राजभाषा तक सीमित नहीं रखना चाहते थे,बल्कि उनका लक्ष्य उसे भविष्य में राष्ट्रभाषा का स्थान दिलाना था,क्योंकि उस समय संविधान सभा के कुछ सदस्य हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में हिचकिचा रहे थे। इस अनुच्छेद में यह भाव भी निहित है कि हिन्दी के विकास का उद्देश्य न केवल भाषायी दृष्टि से एकात्मकता स्थापित करना है,बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक तथा भावनात्मक दृष्टि से भी एकात्मकता स्थापित कर समन्वित संस्कृति का निर्माण भी करना है ताकि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का पद मिलने में कोई बाधा न आए। इसके साथ-साथ संविधान की अष्टम अनुसूची में उल्लिखित २२ भाषाओं को देने का उद्देश्य यह था कि ये भारतीय भाषाएँ अपना विकास करते हुए हिन्दी भाषा के विकास में भी सहयोग देंगी। इसके संकेत अनुच्छेद ३५१ में मिल जाते हैं।

राष्ट्रभाषा से अभिप्राय समूचे राष्ट्र या देश की भाषा से है। वह समूचे देश में बोली और समझी जाती हो,और उसका यह स्वरूप सदैव अक्षुण्ण बना रहता है। यह न तो उत्तर की या दक्षिण की भाषा होती है और न ही पूर्व की या पश्चिम की भाषा होती है। यह तो समूचे देश की भाषा होती है। यह मात्र विद्वानों और शोधर्थियों की भाषा तक सीमित न रह कर जन-जन की भाषा होती है। विभिन्न भाषा-भाषियों और समुदायों के बीच सेतु का काम करती है और उनमें सौहार्द्र और सदभावना का संबंध बनाए रखती है। समूचे राष्ट्र की सामाजिक-सांस्कृतिक तथा भावनात्मक एकता का निर्माण करती है। इस भाषा की प्रकृति सार्वदेशिकता,सर्वसमावेशिकता,प्राचीन परम्परा, जीवंतता,स्वायत्तता,उदारतावादी दृष्टिकोण,अनेक स्रोतीय शब्द-संवर्धन,मानकीकारण,संप्रेषणीयता एवं बोधगम्यता आदि विशिष्टताओं के कारण अखिल भारतीय हो गई है। इसकी प्रकृति में बिहारी हिन्दी,पंजाबी हिन्दी,हैदराबादी हिन्दी,मुंबइया हिन्दी,कोलकतिया हिन्दी आदि अनेक रूप मिलते हैं। भाषा के ये रूप उसके व्यापक एवं विशाल प्रयोग के द्योतक हैं। वे सभी भारतीयों के लिए बोधगम्य रहेंगे,क्योंकि इन रूपों में उसकी आत्मा एक ही बसती है।

भारत की यह राष्ट्रीय आवश्यकता है कि,राष्ट्र की एक राष्ट्रभाषा हो,क्योंकि राष्ट्रभाषा ही देश में राष्ट्रीय चेतना जगा सकती है, राष्ट्रभाषा ही सांस्कृतिक चेतना पैदा कर सकती है,राष्ट्रभाषा ही जन-जन में राष्ट्रवाद की भावना प्रज्वलित कर सकती है। यह भूमिका हिंदी ही निभा सकती है। इसने संविधान की अष्टम अनुसूची में उल्लिखित संस्कृत,बांग्ला,मराठी,गुजराती,तमिल,तेलुगू आदि सभी भारतीय भाषाओं और अरबी,फारसी,तुर्की,अंग्रेज़ी आदि अनेक विदेशी भाषाओं के शब्दों को अपना कर और आत्मसात् कर अपना सर्वसमावेशी रूप धारण कर लिया है। इस राष्ट्रभाषा को सभी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं का भी हिन्दी के साथ आत्मसातीकरण एवं समन्वय हो गया है और यह समृद्ध एवं विकसित भाषा बन गई है। शब्द,भाव,रूप और शैली की दृष्टि से यह भाषा अखिल भारतीय हिन्दी हो गई है। इसके व्यापक प्रयोग के कारण इसके कई रूपों और शैलियों का उदभव हो गया है। यह भाषा जनपदीय संदर्भ की भाषा से उठ कर राष्ट्रीय संदर्भ की भाषा बन गई है और वैश्विक संदर्भ की भाषा बनने की ओर पूर्णतया अग्रसर है। इसलिए,अब समय आ गया है कि हिन्दी को केवल राजभाषा तक सीमित न रख उसे राष्ट्रभाषा के पद पर गौरवान्वित किया जाए।

 

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