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रेखा की ग़ज़लें उनके जीवनानुभव की दास्तान-पंकज करण

पटना (बिहार)।

रेखा भारती मिश्रा की ग़ज़लों में शाश्वत प्रेम की अभिव्यक्ति है। प्रेम की बदौलत दुनिया की हर चीज़ को जीता जा सकता है। रेखा की ग़ज़लें उनके जीवनानुभव की दास्तान है। आज विद्रूप होते समय में प्रेम, सद्भाव और संबंध को बचाने की ज़रूरत है। इक्कीसवीं सदी के इस दौर में मानवता, प्रेम और संवेदना को बचाने की ज़िद रेखा भारती मिश्रा के रचनाकर्म का मूल पक्ष है। अपने इस ग़ज़ल संग्रह के माध्यम से वे अपनी कोशिश में कामयाब हुई हैं। प्रेम का प्रतिनिधित्व करती इनकी ग़ज़लें समय-सापेक्ष हैं।
यह बात भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए चर्चित शायर पंकज करण ने कही। आभासी माध्यम से आयोजित इस सम्मेलन का संचालन करते हुए संयोजक सिद्धेश्वर ने कहा कि, ग़ज़ल को कविता के चश्मे से ना देखें। शेर कहना बहुत आसान है, लेकिन खूबसूरत शेर कहना बहुत कठिन है। इसके लिए अनुभूतियों के गहरे समुंदरों को खंगालना पड़ता है, तभी कोई आबदार मोती हाथ लगता है। मुक्तछंद कविता, बाल कविता, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य जैसी विधाओं पर समान अधिकार रखने वाली रेखा भारती मिश्रा का यह ग़ज़ल संग्रह रूमानी एहसास तो कराता ही है, हमारे समाज में व्याप्त विसंगतियों को भी दर्द की आँच में पकाकर ग़ज़ल के माध्यम से अभिव्यक्त करने में भी अपना हुनर दर्शाता है। जब वह कह उठती है-
“माना तुम ले लोगे सारी दौलत मेरी। पर कैसे ले पाओगे यह शोहरत मेरी। झूठों का बाजार सजाकर रखते हो तुम, सच के दामन में सोना है फितरत मेरी॥”
रेखा भारती मिश्रा के नवीन ग़ज़ल संग्रह ‘बात आँखों की’ पर सिद्धेश्वर ने कहा कि, अपने अनोखे अंदाज ए बयां के कारण रेखा जी अपनी अलग पहचान बना पाने में पूर्णत: सफल है।
मुख्य अतिथि समकालीन कवयित्री रेखा मिश्रा ने कहा कि, ग़ज़ल एक ऐसी छांदस विधा है, जिसमें एक ही बहर और वज़न के अनुसार कई शेर लिखे जाते हैं। सोच की शिला पर शब्द की आकृतियां उकेरी जाती हैं। ग़ज़ल आज के दौर में पाठक या श्रोता के बीच एक उत्सव की भाँति उनके जीवन में रच-बस गई है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. मंजू सक्सेना ने कहा कि जीवंत कविता वही है, जो हमारे हृदय के भीतर वैचारिक हलचल पैदा कर दे। पिछले ३ वर्षों से सिद्धेश्वर जी सोशल मीडिया के माध्यम से कविता और लघुकथा को देशभर के लोगों से जोड़ने में सफल हैं।
द्वितीय सत्र में लगभग २ दर्जन कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचना से मूल्य, मनुष्यता और प्रेम को बचाने का आह्वान किया। इन पर पंकज करण ने बहुत ही गंभीरता से अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी प्रस्तुत की और अपनी २ ग़ज़लों का पाठ किया। रेखा मिश्रा ने भी एकल पाठ के तहत १२ ग़ज़लों का पाठ किया। रत्ना मणिक, निर्मल कुमार डे, डॉ. अलका वर्मा, राज प्रिया रानी और उषा कुमारी आदि ने भी अपनी श्रेष्ठ रचनाओं का पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन इंदू उपाध्याय ने किया।

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