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अजीब है दुनिया

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-२१…

अपनी ज़िंदगी को खुली किताब मत बनाइए, क्योंकि लोगों को पढ़ने में नहीं, बल्कि पन्ने फाड़ने में मजा आता है। खिचड़ी की विशेषता देखिए- अगर बर्तन में पकती है तो बीमार को ठीक कर देती है और दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है।
  अजीब है दुनिया-मरने वाले को रोने वाले हजार मिल जाएंगे, मगर जो जिंदा है, उसे समझने वाला एक भी नहीं मिलता है। समय का खेल भी निराला है, भरी जेब ने दु‌निया से पहचान कराई, और खाली जेब ने इंसानों की। जो लोग हमें पसंद नहीं करते हैं, उनके बारे में अजीब बात यह है, कि वे हमारी हर चीज पर नजर रखते हैं। हमारी ज़िन्दगी भी अजीब है-होती तो है हमारी, पर जीना दूसरों के लिए पड़ता है। गर्लफ्रेंड को शराब पीते देख ब्वायफ्रेंड ने पूछा- तुम लड़की हो के भी शराब पीती हो ? गर्लफ्रेंड ने जवाब दिया, कि क्या २-४ पैग पीने के लिए अपना जेंडर बदल लूँ।
   लकड़ी के कीड़े पूरी कुर्सी खा जाते हैं और कुर्सी के कीड़े पूरा देश खा जाते हैं। आधुनिक युग में आप अच्छे इंसान की पहचान नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आँसू और मुस्कान दोनों नकली हो गए हैं।     
    आजकल जन्म और मृत्यु दोनों ही मँहगे हो गए हैं, क्योंकि आजकल प्रसव ‘सीजेरियन’ ही होता है। इसमें आपकी सेहत बने या बने, पर डॉक्टर का बिल अच्छा बन जाता है और वेंटिलेटर पर रखकर डॉक्टर मृत शरीर को भी जिन्दा दिखा देते हैं। वो क्या समय था, जब किसी को स्टेशन छोड़ने जाते थे, तो आँख नम हो जाती थी। अब तो श्मशान घाट पर भी आदमी मोबाईल में व्यस्त रहता है। अगर आपको ऊँचाई पर जाना है तो बाज बनिए, धोखेबाज नहीं।
  देखिए देश की हालत-फूल बेचने वाला घर-घर जाता है और शराब खरीदने के लिए हम स्वयं जाते हैं। दूध वाले से हम पूछते हैं, कि इसमें पानी तो नहीं मिलाया, जबकि शराब में पानी मिलाकर पीते हैं। इंसान की सोच भी अजीब है, उसको ‘जानवर’ कहो तो नाराज हो जाता है और उसको ‘शेर’ कहो तो खुश हो जाता है। हमें पता होता है कि हमारे पास कितने पैसे हैं, लेकिन ये पता नहीं होता कि ह‌मारे पास समय कितना है ? इसलिए समय का सदुपयोग करो। अगर आप सफल बनना चाहते हैं तो दुनिया को नहीं; बल्कि खुद को बदलना शुरू करो। यह जरूरी नहीं है, कि कुछ गलत करने से ही दु:ख मिले, कभी-कभी हद से ज्यादा अच्छा होने की कीमत चुकाना पड़ती है।
        जब तक घर में टेलीफोन था, संयुक्त परिवार था। मोबाईल ने घर के प्रत्येक आदमी को अलग कर दिया। यदि आप चाहते हैं, कि मूर्ख लोग आप पर शासन न करें तो आप भी राजनीति में भाग लेना शुरू कीजिए। केवल भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां साधु-संतों के पास मर्सिडीज, रेंज रोवर, हेलीकॉप्टर तक मिल सकता है, क्योंकि ये मोह-माया से दूर रहते हैं।    
     राजनीति की फसल हमारे देश में बहुत अच्छी तरह से हो रही है, इसलिए हमारा कृषि प्रधान देश कुर्सी प्रधान हो गया है।
   जिस देश में विद्यालय की छत टपकती हो, और मंदिरों तथा मस्जिदों की छत सोने से जड़ी हो; वो देश कभी तरक्की नहीं कर सकता है। आजकल राजनीति में यह बात आम हो गई है, कि चरित्र चाहे कितना गिर जाए; परंतु सरकार नहीं गिरना चाहिए। एक ताजा सर्वे के अनुसार सबसे मीठी बोली कोयल की नहीं, बल्कि उधार माँगने वाले व्यक्ति की होती है। जहाँ इज्जत ना मिले, वहाँ नहीं जाना चाहिए, ये चाणक्य ने कहा था। भाड़ में जाए चाणक्य के उपदेश- क्या बंदा शाम को अपने घर भी न जाए। हमें घड़ी की सुई की तरह बनना चाहिए। समय जैसा भी हो, चलते रहना चाहिए। सत्संग में प्रवचन चल रहा था- इस जन्म में जो पुरुष है, वो अगले जन्म में भी पुरूष रहेगा और स्त्री भी अगले जन्म में स्त्री रहेगी। यह सुनकर एक स्त्री संत्सग छोड़ कर जाने लगी तो कथा वाचक ने कारण पूछा। स्त्री ने कहा- बाबा, जब मुझे अगले जन्म भी रोटियाँ बेलनी है तो सत्संग सुनने का क्या फायदा!-
   आज के दौर के लोगों में वफा ढूंढ रहे हो, 
बड़े नादां हो, जहर की शीशी में दवा ढूंढ रहे हो।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |