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संग जाएंगे कर्म ही तेरे

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड) 
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इस जहां में क्या है मेरा,
फिर देखूँ क्या कुछ है तेरा
इसी उधेड़बुन में मन डोल रहा,
आत्मबल से आज सब तौल रहा।

कहता आया रहता मैं जहाँ वह मेरा घर,
जिसे मैंने जन्म दिया वह मेरी संतान
काम के बदले जो कुछ मिला वह मेरा धन,
फिर सोचा रिश्ते-नातों में भी बसता तन-मन।

इतने में मैंने जाना जहां में है बहुत-कुछ,
फिर दिया ध्यान यहाँ भी है बहुत तुच्छ
जिससे मेरी शत्रुता वह मेरे लिए बेकार,
सोचा जहां में क्या है उसका आधार।

सोचते-सोचते गया था मैं सो,
फिर आत्मा बोलने लगी-जीवंत हो
तुम्हें सत्य का नहीं हो रहा ज्ञान,
चलो तुम मेरे संग लगाओ ध्यान।

आज जिसे अपना कहते हो,
वह कल था बताओ किसका
जब तुम दुनिया से चले जाओगे,
क्या उपभोग कर पाओगे उसका।

देखो वह है जो आज तेरा घर,
उसे छोड़ गया है कोई मर कर
अपना समझते जिसे संतान या धन,
मरने के बाद छूट जाएगा कण-कण।

तुम्हारी यादें भी जहां से मिट जाएगी,
दो पल रोते-रोते अपने भी छूट जाएंगे
ना धन ना दौलत और ना ही संतानें,
जहां से कुछ भी तेरे साथ न जाएंगे।

फिर सोच क्यों होते हो तुम दुखी,
क्या लाए थे तुम, क्या ले जाओगे
ले ज्ञान, कौन है अपना जान,
सत्कर्म कर, यही है सबसे महान।

आते वक्त था भाग्य तेरे साथ,
अच्छे बुरे या हो फिर अधूरे।
कर्म करोगे तुम जैसे पूरे,
संग जाएंगे कर्म ही तेरे॥

परिचय– साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव- लोहापिटटी में हैL जन्मतारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद हैL भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन(डिप्लोमा)की शिक्षा प्राप्त की हैL साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल हैL आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी(विद्यालय में शिक्षक) हैL सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैंL लेखन विधा-कविता एवं लेख हैL इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना हैL पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैंL विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।

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