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सफ़र में..

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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मैं यूँ ही चल रहा था सफ़र में,
रास्तों पर हर एक ‘रंग’ देख रहा था
जीवन की गाड़ी को ‘पटरी” पर लाने,
मैं चल रहा था सफर में…।

कभी पटरी पर, कभी रास्तों पर,
मैं निकल रहा था ‘मंजिल’ की तलाश में
क्योंकि चलना ही ‘ज़िन्दगी’ होती है,
इसलिए मैं चल रहा था सफ़र में…।

इन घनघोर अंधेरों में, सुनसान राहों पर,
एक रोशनी की उम्मीद में चल रहा
रुकना तो कोई ‘जीत’ वाली बात नहीं,
इसलिए मैं चल रहा था सफ़र में…।

इतना आसान नहीं होता,

हर किसी को मंजिल पाने में,
बहुत उतार-चढ़ाव होता है, जीवन में
तब जाकर कहीं ‘मंज़िल’ दिखाई देती है…।
इसलिए मैं चल रहा था ‘सफर’ में…॥