कुल पृष्ठ दर्शन : 185

You are currently viewing सार्वजनिक गणेशोत्सव के प्रणेता लोकमान्य तिलक

सार्वजनिक गणेशोत्सव के प्रणेता लोकमान्य तिलक

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
***********************************************

पुण्यतिथि विशेष…..

राष्ट्रवादी,शिक्षक,समाज सुधारक,वकील, ‘पूर्ण स्वराज’ के पैरोकार और भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रथम लोकप्रिय नेता बाल गंगाधर तिलक (६५ वर्ष की उम्र में १ अगस्त १९२० को मुम्बई से ही स्वर्गारोहण) को उनकी १०१ वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए याद दिलाना चाहूंगा कि इनको ‘लोकमान्य’ की आदरणीय उपाधि प्राप्त होने के कारण सभी उनका लोकमान्य तिलक के नाम से भी उल्लेख करते हैं।
बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नरमपंथी रवैए के विरुद्ध आवाज उठाने वाले लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल को समर्थन दिया,जिसके चलते इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। इस कारण से कांग्रेस अनेक साल तक गरम दल और नरम दल में विभाजित रही।
२ महत्वपूर्ण तथ्य ध्यानार्थ-पहला तो यह कि, कांग्रेस में गरम दल के सदस्य होने के बावजूद इन्हें मरणोपरान्त श्रद्धाञ्जलि देते हुए नरम दल के गान्धी जी ने इन्हें आधुनिक भारत का निर्माता बताया तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय क्रान्ति का जनक। दूसरा इनके बचपन से जुड़ा एक ऐतिहासिक तथ्य,जिसके अनुसार एक बार कक्षा में कुछ छात्रों ने मूंगफली के छिलके फर्श पर फेंक गन्दगी फैला दी। इसके चलते कक्षा अध्यापक नाराजगी दर्शाते सभी को पूछा कि यह किसका काम है,लेकिन किसी भी छात्र ने अपनी गलती नहीं मानी। तब अध्यापक पूरी कक्षा को ही दंडित करने की घोषणा कर प्रत्येक छात्र के हाथों पर छड़ी से मारने लगे,लेकिन जब बाल गंगाधर तिलक की बारी आई तो उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया ही नहीं,बल्कि स्पष्ट कह दिया कि जब मैंने मूंगफली खाई ही नहीं तो मैं बेंत भी नहीं खाऊंगा। यह सुन अध्यापक फिर पूछ बैठे कि बताओ यह किसने किया। उत्तर में इन्होंने कह दिया कि न तो मैं किसी का नाम बताऊंगा और न ही बेंत खाऊंगा। इसके फलस्वरूप जब अध्यापक ने इनकी शिकायत प्राचार्य से की,तब इनके अभिभावक को शाला आना पड़ा और इनको विद्यालय निकाल दिया गया। यह घटना यह दर्शाती है कि ये बचपन से ही कठोर अनुशासन का पालन करते हुए सच्‍चाई पर अडिग डटे रहते थे,साथ ही साथियों की अनुशासनहीनता की कभी चुगली नहीं करते थे। इसी गुण के चलते ये हमेशा कांग्रेस में सभी के बीच आदरणीय बने रहे।
इन्होंने अपनी मृत्यु के करीबन ४ साल पहले अप्रैल १९१६ में ‘होम रूल लीग’ की स्थापना कर दी थी, जिसका इनकी मृत्यु पश्चात कांग्रेस में विलय हो गया। इस होम रूल आन्दोलन के चलते ही तिलक को काफी प्रसिद्धि मिली,क्योंकि इसी को माध्यम बना जनजागृति के कार्यक्रम का श्रीगणेश कर सर्वप्रथम पूर्ण स्वराज की मांग पर पूरा जोर लगा दिया। उस समय तक उनके द्वारा मराठी भाषा में लगाया गया नारा ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच’,जिसका हिन्दी में अर्थ है ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा’,बहुत ही प्रसिद्ध हो चुका था। यानि यह नारा भारतीय स्वाभिमान और गौरव के प्रेरणास्त्रोत के रूप में उभर चुका था। इन्होनें पूरे भारत के लिए समान लिपि के रूप में देवनागरी की वकालत भी पुरजोर ढंग से की थी। इन्हीं कारणों से उन्हें सार्वजनिक रूप से ‘लोकमान्य’ अर्थात ‘प्रिय नेता’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
जनजागृति वाली सोच इनके दिमाग में बहुत पहले से ही थी। यही कारण रहा कि साल १८९३ में इसी जनजागृति को स्थायित्व देने के उद्देश्य से इनके प्रयास के कारण महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सार्वजनिक रूप से सप्ताह भर मनाना प्रारम्भ हुआ,जो आज इतना लोकप्रिय उत्सव बन प्रसिद्धि के शिखर पर पूरे देश में जाना जाने लगा है। इस सार्वजनिक रूप से मनाए जाने वाले गणेश तथा शिवाजी उत्सव को लोकप्रिय बनाने में इनके स्वामित्व वाले २ समाचार पत्रों का अतुलनीय योगदान रहा था। इन दोनों के ये जीवनपर्यन्त सम्पादक भी रहे।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इन्होंने अपने सिद्धांतों से बिना किसी भी प्रकार का समझौता किए सदैव पारम्परिक सनातन धर्म का मृत्यु पर्यन्त निर्वहन किया। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सनातन धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखते हुए भी इनके व्यक्तित्व में संकीर्णता कभी भी लेशमात्र भी परिलक्षित नहीं हुई। हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि ये अपने समय के प्रणेता थे। इनके अद्वितीय देश प्रेम एवं सनातन धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था के मद्देनजर ही इनको हिंदू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है।

Leave a Reply