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हमारा चौकीदार

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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आज देश की गली-गली में गूँजा एक ही नारा है,
देश को जो चोटी पर रक्खे वो सरदार हमारा हैl

कुछ ही वर्षों में भारत में नयी रोशनी ले आया,
जहाँ-जहाँ पिछड़ा था भारत उसको आगे पहुँचायाl
सर्वसम्मति से जनता ने तेरा नाम पुकारा है,
देश को चोटी पर…

आज तलक जो देश हमारा तिल-तिल मरता जाता था,
ऐसा होता था क्योंकि खुद बाड़ खेत को खाता थाl
जिसमें खाये छेद उसी में उसका नहीं किनारा है,
देश को चोटी…

जितने भी अभियान चलाये थे सबमें वो सफल रहा,
सारी दुनिया मान गयी है जो सोचा था वही कियाl
हमको लगता है भारत का तू ही तारनहारा है,
देश को चोटी…

दिन देखा-ना रात हमेशा देशकर्म में लीन रहा,
भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिश में ही तल्लीन रहाl
काला धन वापस लाने का पक्का मन में धारा है,
देश को चोटी पर…

शान्ति विश्व में बनी रहे सो दौर विदेशी चलते थे,
आतंकवाद से मुक्त विश्व हो दिल में सपने पलते थेl
सबको इक झण्डे के नीचे लाना कर्म तुम्हारा है,
देश को चोटी…

सारे भारत में सड़कों का ऐसा जाल बिछाया है,
छोटे-छोटे गाँव शहर को आपस में मिलवाया हैl
जहाँ नहीं पहुँची थी बिजली वहाँ किया लश्कारा है,
देश को जो चोटी…

वक्त आ गया है अपना फिर से कर्तव्य निभाने का,
जो भारत को रखे सुरक्षित उसी हाथ पहुँचाने काl
वही हाथ मजबूत करें अब ये कर्तव्य हमारा है,
देश को जो चोटी पर…..

है अपील ऐ देशवासियों अपना धर्म निभाना तुम,
आन वतन की सबसे ऊँची,नीचे नहीं झुकाना तुम।
देश में कैसा राजा हो चुनना अधिकार तुम्हारा है,
देश को जो चोटी पर रक्खे वो सरदार हमारा है॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है।