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होली हमें हर्षाती है

उमेशचन्द यादव
बलिया (उत्तरप्रदेश) 
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रंग और हम(होली स्पर्धा विशेष )…

कुछ दिन पहले की बात है। मैं फोन पर साधु बाबा से बात कर रहा था। अभी वसंत ऋतु चल रही है तो इसके बारे में बात करते हुए हम रंगों के त्योहार होली के बारे में बात करने लगे। मैं कुछ बातें यहां- वहां से सुनकर जानता तो था लेकिन जिज्ञासा बढ़ने लगी। और मैंने बाबा से पूछ लिया कि आपके बचपन की होली कैसी होती थी ? और आपके दादा या बुजुर्गों ने होली के बारे में क्या बताया था ? बस,इतनी बात सुनते ही बाबा भी देर तक बताते गए और मैं ध्यान से सुनता रहा-
होली रंगों का तथा हँसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है,जो आज विश्वभर में मनाया जाने लगा है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली,होलिका आदि नामों से मनाया जाता है। वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से २ दिन मनाया जाता है। यह प्रमुखता से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलाई जाती है,जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। इसके बारे में एक पौराणिक कहानी है जिसमें भी कुछ बताकर कुछ छुपाय़ा गया है।
इस दिन घमंड और हर तरह की बुरी चीजों और आदतों की आहुति दी जाती है। होलिका के फेरे लगाकर मंगल-कामना की जाती है और राख से तिलक लगाया जाता है। इस दिन नकारात्मकता को त्यागकर सकारात्मकता को अपनाया जाता है।
‘जागो रे मानव जागो,
सच्चाई से दूर मत भागो
अपने सुकर्मों से प्यारे,
दुष्टों को मजा चखा दो।’
दूसरे दिन,जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी,धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं। लोग एक-दूसरे पर रंग,अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं,ढोल बजा कर होली के गीत गाए जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं,गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेश वाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही,पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे,पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झांझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं यहाँ तक कि लोग अपने पशुओं पर भी रंग लगाते हैं।
फिर बाबा बताने लगे-गुझिया होली का प्रमुख पकवान है,जो मावा (खोया) और मैदा से बनती है और मेवाओं से युक्त होती है। इस दिन कांजी के बड़े खाने व खिलाने का भी रिवाज है। होली मिलने जाने पर सबका स्वागत गुझिया,नमकीन व ठंडाई से किया जाता है।
ब्रज की होली,मथुरा की होली,वृंदावन की होली, बरसाने की होली,काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है।
आजकल अच्छी गुणवत्ता के रंगों का प्रयोग नहीं होता और त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले रंग खेले जाते हैं। यह सरासर गलत है। इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहना चाहिए। बच्चों को भी सावधानी रखनी चाहिए। कुछ बुराइयों पर रोक लगा दें तो होली के त्योहार का रंग फीका नहीं पड़ने पाएगा। हमें हर प्रकार से यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे किसी भी कार्य से किसी को कोई नुकसान ना हो। ना ही प्रकृति और ना ही किसी भी जीव-जंतु का। जिस प्रकार प्रकृति में बहार छाई रहती है ठीक उसी प्रकार हम सबके जीवन में भी बहार छाई रहे। इस प्रकार बाबा ने अनेक आशीर्वचन दिए।-
होली तो हमें हर्षाती है,
खुशियों का रंग बरसाती है
‘उमेश’ की लेखनी मधुर चले,
शब्दों का रंग लहराती है।
होली तो हमें हर्षाती है,
खुशियों का रंग बरसाती है॥

परिचय–उमेशचन्द यादव की जन्मतिथि २ अगस्त १९८५ और जन्म स्थान चकरा कोल्हुवाँ(वीरपुरा)जिला बलिया है। उत्तर प्रदेश राज्य के निवासी श्री यादव की शैक्षिक योग्यता एम.ए. एवं बी.एड. है। आपका कार्यक्षेत्र-शिक्षण है। आप कविता,लेख एवं कहानी लेखन करते हैं। लेखन का उद्देश्य-सामाजिक जागरूकता फैलाना,हिंदी भाषा का विकास और प्रचार-प्रसार करना है।

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