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‘छू लिया आसमां’ अपराध, प्रेम और विश्वासघात का जटिल ताना-बाना

सपना सी.पी. साहू ‘स्वप्निल’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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समीक्षा….

साहित्य की दुनिया में कुछ लेखक ऐसे होते हैं जो मनोरंजन ही नहीं करते, बल्कि पाठकों को सामाजिक हकीकत से भी रूबरू कराते हैं। लियाकत मंसूरी एक ऐसा ही नाम बन चुके हैं, जिन्होंने रोमांचक लेखन शैली से हिंदी क्राइम थ्रिलर पाठकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। मैंने उनके पहले और दूसरे उपन्यास ‘छू लिया आसमां’ तथा ‘शहनाज और मेरी कहानी’ को पढ़ा और यह तीसरा उपन्यास ‘छू लिया आसमां’ पढ़कर पता चला कि यह उनके पहले उपन्यास ‘मुझे उड़ने दो’ का दूसरा भाग है। यह उपन्यास (आराध्या प्रकाशन, मेरठ) भी पहले २ उपन्यासों की तरह अपराध की दुनिया की भयावहता, मानवीय भावनाओं की जटिलता और विश्वासघात के परिणामों को एकसाथ प्रस्तुत करता है।
यह कहानी बचपन की यादों से शुरू होती है और तलत की आत्महत्या की कोशिश और उससे ज़िंदगी एवं मौत के बीच परत-दर-परत इंसानी गलतियों और सुधार पर समाप्त होती है। इस उपन्यास की कहानियाँ काफी सघन और परतदार है। यह मुख्यतः २ मुख्य धाराओं में विभाजित है जो अंततः एक-दूसरे से मिल जाती हैं। इसमें अपराध का दुष्चक्र है। कहानी का एक हिस्सा लुबना नामक पात्र के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसे वह मासूम आसिफ (जो बाद में अपराध की दुनिया का आसिफ ‘तमंचा’ बन जाता है) से प्रेम करने लगती है। प्यार में अंधापन व परिस्थितियों का दबाव कैसे एक सामान्य इंसान को अपराध की ओर धकेलता है, यह कहानी इसका सजीव चित्रण करती है। एक क्रिकेट मैच के दौरान हुए मामूली झगड़े ने विकराल रूप ले लिया और आसिफ ने अपने ही एक साथी क्रिकेटर की हत्या कर दी। यहीं से उसका अपराधी जीवन शुरू होता है। वह एक हिस्ट्रीशीटर कुतुबुद्दीन बावला के संपर्क में आता है और जुर्म की दुनिया में बढ़ता जाता है। इसमें लिखी भाषा शैली सोचने पर विवश करती है, कि मासूमियत गलत लोगों के संपर्क में आने से किस तरह जीवन को गलत राह पर ले जाती है।
लालच और साजिश के इर्द-गिर्द कहानी में एक अन्य महत्वपूर्ण पात्र ‘सितारा’ भी है। उसका उद्देश्य अमीर बनना है, और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वह लुबना को एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करती है। सितारा, आसिफ को अपराध के रास्ते पर ही आगे बढ़ाती है और जब आसिफ लूट की सारी रकम सितारा के हवाले कर देता है, तो अपना मकसद पूरा होते ही सितारा उसे मरवाने की साजिश रचती है। यह हिस्सा कहानी में तनाव और विश्वासघात के चरम को दर्शाता है।
उपन्यास में जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगते हैं, प्रेम और जीवन में नयापन तलत और सहर के माध्यम से देखने को मिलता है। उपन्यास का दूसरा पहलू है जो ‘मुझे उड़ने दो’ की कहानी को आगे बढ़ाता है। तलत, जो आत्महत्या की कोशिश करता है वह अस्पताल में होश में आता है, जीवन को एक नई दृष्टि से देखता है। वह अपराध की दुनिया से मुँह मोड़ लेता है, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहानी में मोड़ तब आता है, जब लुबना अपना दिल तलत को दे बैठती है। यहाँ से एक त्रिकोणीय प्रेम कहानी ‘तलत’, ‘लुबना’ और ‘सदा’ की शुरू होती है, जो पुराने रहस्यों और नए भावनाओं के द्वंद्व में फंसी हुई है।
लियाकत मंसूरी के इस उपन्यास को ​पात्र चित्रण और मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से देखें तो यह पात्रों के मानसिक द्वंद्व को गहराई से उभारता है। ​आसिफ ‘तमंचा’ केवल एक अपराधी नहीं है, बल्कि परिस्थितियों का मारा ऐसा व्यक्ति है जो प्यार और दबाव में गलत फैसले ले लेता है। वहीं ​लुबना प्रेम और अपराध के बीच फंसी एक ऐसी महिला है, जो अपने दिल की सुनती है, लेकिन उसके परिणाम गंभीर होते हैं। ​सितारा का पात्र लालच और चालाकी का प्रतीक है, जो कहानी में खलनायिका की भूमिका निभाती है। ​तलत सुधार और प्रेम की आशा का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने अतीत से निकलकर एक नया जीवन शुरू करना चाहता है। सदा एक भारतीय नारी है, जो अपने पति की गलतियों को माफ़ करके फिर नए जीवन की शुरुआत का हौंसला देती है।
यह ​थ्रिलर तत्व और रहस्य से भरा ​एक सफल, रोचक अपराध थ्रिलर बन पड़ा है। यह उपन्यास पाठकों को अंत तक बांधे रखने का वादा करता है। लूट की रकम, पुलिस मुठभेड़ का डर और सितारा की चालें कहानी में गति प्रदान करती हैं। लेखक ने बहुत सारी गुत्थियाँ ऐसी छोड़ी हैं, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं कि अगला कदम क्या होगा। ‘मुझे उड़ने दो’ की सफलता के बाद इस दूसरे भाग में रहस्य का स्तर और ऊँचा हो गया है।
इसकी ​भाषा और शैली की बात करें तो भाषा सरल, प्रवाहमयी और बोल-चाल की हिंदी के बहुत करीब है, जो इस शैली के उपन्यासों के लिए बहुत जरूरी है, ताकि पाठक सीधे कहानी से जुड़ सकें। संवादों में कसावट है, जो दृश्यों को जीवंत बनाती हैं।
‘छू लिया आसमां’ केवल एक थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह मानवीय व्यवहार का अध्ययन भी है। यह दिखाता है कि कैसे प्यार हमें सबसे ऊँचाई पर ले जा सकता है और कैसे गलत रास्ते पर चलने का फैसला हमें पाताल में गिरा सकता है। यदि उपन्यास पढ़ना पसंद है तो रहस्य, रोमांच और मानवीय भावनाओं के उतार-चढ़ाव वाली २५ भागों वाली कहानियों से सजा यह गुलदस्ता जरूर पसंद आएगा। यह उपन्यास आपके संग्रह में शामिल करने योग्य है।
​लियाकत मंसूरी ने अपनी इस तीसरी कृति से क्राइम थ्रिलर के क्षेत्र में अपनी ‘हैट्रिक’ पूरी की है और पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास किया है। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध का ‘आसमां’ छूने की कोशिश में हम अपनी इंसानियत को कितनी दूर छोड़ आते हैं।