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चंद उदासियाँ

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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ज़िन्दगी में उदासियाँ आती ही रहती हैं,
कभी किसी से मतभेद भी होते हैं
मन में उदासी हो ही जाती है,
मन बेचैन होकर उदासी में खो जाता है।

अब हर समय यही उदासी दिल पर छाई रहती है,
किसी भी काम को करने की इच्छा नहीं होती
दुश्वार हो जाता है समय काटना भी,
मन की इच्छा के विरुद्ध जो भी काम होता है।

मन पर उदासी छा ही जाती है,
किसी भी तरह से मन कहीं लग नहीं पाता
दुःख ही दुःख है यह जीवन,
दुःख के सागर में डूबा रहता मानव मन।

हँसते हुए भी न जाने क्यों,
हर पल बेचैनी रहती है
दुःख में हँस कर कहो क्यों,
ग़मगीन मन रहता है।

चाहे छोटा हो या बड़ा,
किसी न किसी रूप में
कभी न कभी धूप में,
छिपी रहती है जैसे छाया।

उदासी को भगाने के लिए,
हर पल संघर्ष करते रहो
भागेगी उदासी,
जीवन में कर्म करो हरदम।

इन्सान आगे बढ़ता जाता,
उदासियाँ पीछे छूटती जातीं।
कर्म करते रहो, मन बहलता जाएगा,
ग़म पीछे छूटता जाएगा॥