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अटूट विज्ञानी रहे आचार्य जगदीश चन्द्र बसु

गोपाल चन्द्र मुखर्जी
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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भारत व विश्व के महान वैज्ञानिक, रेडियो के जनक तथा भौतिक शास्त्र,जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, पुरातत्वविद,बहु शास्त्र में ज्ञानी,विज्ञान विषयक लेखक,सी.एस.आई, सी.आई.ई.एफ.आर.एस.भारत का पहला विज्ञानी जिनको अमेरिकन पेटेन्ट मिला। ‘नाइट’ उपाधि से सम्मानित,रायल सोसायटी लंदन के फैलो डॉ. जगदीश चन्द्र बसु को श्रद्धापूर्ण प्रणाम। अति साधारण प्रयोगशाला एवं अल्प मूल्य के उपकरणों से आचार्य बसु ने शोध कार्य पूरा करते हुए विश्व को विज्ञान के अति गुरुत्वपूर्ण एवं चमत्कारिक आविष्कार का खजाना दिया था। बसु जी का पिताजी की इच्छा के अनुसार बाल्यकाल में अध्ययन ग्राम के एक साधारण विद्यालय से शुरू हुआ था। कारण उनका पिताजी के मतानुसार प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषा से ही होना चाहिए। बाद में कोलकाता से उन्होंने स्नातक की उपाधि को प्राप्त किया था। फिर से उनके पिताजी के रुचि के अनुसार जगदीश चन्द्र भारतीय सिविल सर्विसेस का अध्ययन नहीं कर पाये। जगदीश चन्द्र जी को चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन कराने के लिए लंदन भेज दिया गया,लेकिन विधाता ने तो दूसरा विधान लिखा था। जगदीश चन्द्र को चिकित्सक बनाने के वजाय वैज्ञानिक बना दिए। चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करते समय उनकी अस्वस्थता के कारण बीच में ही पढ़ाई को छोड़ दिया पर उन्होंने फिर से वनस्पति विज्ञान को लेकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन शुरू किया।
आचार्य जगदीश चन्द्र उदार चित्त के अधिकारी थे। उन्होंने अपने शोध कार्य से प्राप्त उपलब्धियों को उनके द्वारा प्रकाशित पत्रिका में दूसरों को जानने व ज्ञानवर्धन कराने के लिए प्रकाश कर देते थे,जिसमें कोई व्यवसायीकरण नहीं था। आचार्य जगदीश चन्द्र रेडियो के जन्मदाता थे। आपने ईथार तरंग का सटीक परिमाप या मिलीमीटर तरंग प्रयोग में लाने का विज्ञान के क्षेत्र में एक चमत्कार किया था। मुक्त अंतरिक्ष में विद्युत चुंबकीय तरंग के अस्तित्व को सफल प्रयोग में लाना,आचार्य की सफल कीर्तियों में एक अमूल्य योगदान था। कोई भी वस्तु,चाहे वह उद्भिद हो या धातु सभी में ही चेतना का अस्तित्व है। आचार्य ने प्रयोग कर दिखाया कि उत्तेजक या असार तत्व का असर सभी वस्तु या उद्भिदों में होता है। उद्भिद में प्राण है, चेतना है एवं जिसका अस्तित्व प्रत्यक्ष होता है। इसका प्रमाण आचार्य ने क्रेस्कोग्राफ यन्त्र आविष्कार या तैयार करते हुए प्रमाणित किया था। विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे बहुत अवदान आचार्य जगदीश चन्द्र बसु के हैं,जिसके लिए आचार्य जी विश्ववरेण्य हैं। खुद की एक उन्नतमान प्रयोगशाला या शोधागार नहीं रहा,इसलिए भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए उन्होंने एक उच्च मान की प्रयोग शाला बनाई,जिसको बोस इन्स्टीट्युट या बसु विज्ञान मन्दिर के नाम से जाना जाता है। २ नवम्बर १९३७ में स्वनाम धन्य,देशप्रेमी,विश्वविख्यात विज्ञानी आचार्य जगदीश चन्द्र बसु का देहावसान ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी क्षति है।

परिचय-गोपाल चन्द्र मुखर्जी का बसेरा जिला -बिलासपुर (छत्तीसगढ़)में है। आपका जन्म २ जून १९५४ को कोलकाता में हुआ है। स्थाई रुप से छत्तीसगढ़ में ही निवासरत श्री मुखर्जी को बंगला,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है। पूर्णतः शिक्षित गोपाल जी का कार्यक्षेत्र-नागरिकों के हित में विभिन्न मुद्दों पर समाजसेवा है,जबकि सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत सामाजिक उन्नयन में सक्रियता हैं। लेखन विधा आलेख व कविता है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में साहित्य के क्षेत्र में ‘साहित्य श्री’ सम्मान,सेरा (श्रेष्ठ) साहित्यिक सम्मान,जातीय कवि परिषद(ढाका) से २ बार सेरा सम्मान प्राप्त हुआ है। इसके अलावा देश-विदेश की विभिन्न संस्थाओं से प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान और छग शासन से २०१६ में गणतंत्र दिवस पर उत्कृष्ट समाज सेवा मूलक कार्यों के लिए प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान मिला है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज और भविष्य की पीढ़ी को देश की उन विभूतियों से अवगत कराना है,जिन्होंने देश या समाज के लिए कीर्ति प्राप्त की है। मुंशी प्रेमचंद को पसंदीदा हिन्दी लेखक और उत्साह को ही प्रेरणापुंज मानने वाले श्री मुखर्जी के देश व हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिंदी भाषा एक बेहद सहजबोध,सरल एवं सर्वजन प्रिय भाषा है। अंग्रेज शासन के पूर्व से ही बंगाल में भी हिंदी भाषा का आदर है। सम्पूर्ण देश में अधिक बोलने एवं समझने वाली भाषा हिंदी है, जिसे सम्मान और अधिक प्रचारित करना सबकी जिम्मेवारी है।” आपका जीवन लक्ष्य-सामाजिक उन्नयन है।