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आराधन नवरात्र का

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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चैत्रशुक्ल शुभ प्रतिपदा,विक्रम संवत् वर्ष।
सृष्टि सृजन प्रारब्ध दिन,हो जीवन उत्कर्ष॥

प्रथम विष्णु अवतार यह,महर्षि गौतम जन्म।
आर्यसमाजी स्थापना,रामराज्य सद्धर्म॥

विक्रम का राज्याभिषेक,राजतिलक रघुराम।
चैत्रमाह नवरात्र का,पुष्पित चहुँ अभिराम॥

हरित भरित पादप लता,कली कुसुम नवरंग।
मादक मन रोचक सुरभि,जीवन खिले उमंग॥

खिली खिली सुष्मित प्रकृति, नयासाल चहुँओर।
भरा गेह नव अन्न से,चहुँदिशि कोकिल शोर॥

लखि किसान मुखहास मन,आनन्दित कविलेख।
अन्नपूर्ण माँ भारती,पुलकित मानव देख॥

मादक मन अलिवृन्द का,मधुमक्खी अनुराग।
विहँसि रहे सुरभित कुसुम,चाहत पुष्प पराग॥

चैत्रमास पावन दिवस,कवि ‘निकुंज’ अभिलास।
रोग शोक मद मोह सब,सर्वशान्ति सुख भास॥

हर ‘कोरोना’ शैलपुत्रि,रामलला हर शोक।
दैहिक दैविक भौतिकी,महारोग को रोक॥

महिषासुर बन कर डटा,कोरोना फिर विश्व।
सुन्दरतम प्रमुदित धरा,खतरे में अस्तित्व॥

कवलित मुख मानव जगत,कोरोना आतंक।
त्राण करो बह्मचारिणि,हर कोरोना कोप॥

तारक बन फिर अवतरित,कोरोना यह पाप।
चन्द्रघण्ट जगदम्बिका,हर तारक संताप॥

महाकाल मधुकैटभ समा,कोरोना दुर्जेय।
हर कुष्माण्डे शान्तिदे,धूमासुर इस हेय॥

स्कन्धमातु करुणामयी,कोरोना नासूर।
चण्ड मुण्ड इस कहर को,चामुण्डे कर दूर॥

रक्तबीज प्रकटित पुनः,कोरोना बन काल।
जगतारिणि कात्यायिनी,हरो दैत्य विकराल॥

कालरात्रि विकराल बन,कोरोना अभिशप्त।
रत निशुम्भ जग ग्रास को,हर दावानल तप्त॥

प्रकटित हो बहुरूपिणी,करो शुम्भ संहार।
कोराना से त्राण कर,दुर्गे दे उपहार॥

रहें दूर हम पाप से,निर्मल रह घर पूज।
सिद्धिदातृ सुख शान्ति दे,हो कोरोना दूज॥

दुर्गा दुर्गति नाशिनी,महाशक्ति जगदम्ब।
रखो स्वस्ति मानव जगत्,तू जीवन अवलम्ब॥

निकुंज दग्ध लखि वेदना,दंशित कोरोना सर्प।
कालविनाशनि कालिके,माँ कुचलो अहि दर्प॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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