बाबा की लाड़ली
कुमारी ऋतंभरामुजफ्फरपुर (बिहार)**************************************** बाबा की मैं लाड़ो थी,छोड़ दिए सब बाग-बगीचेसुन लो मेरे साजन प्रीत,बचपन की सखियाँ छोड़ी। छोड़ दिया मन-मीत,सुन लो मेरे साजन प्रीतबन गई तेरी,छोड़ दिए बचपन के मीत। चंचल तितली थी मैं हरदम,कहाँ पग रहता स्थिरबाबा का आँगन छोड़ चली,सजा लिया घर साजन का। दु:ख के आँसू पीकर,सुख की मुस्कान दिखाईविदा होकर … Read more