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पहला प्यार…एक परी

अख्तर अली शाह `अनन्त`
नीमच (मध्यप्रदेश)

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निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतरकर नजरों में,
दिल मेरा रोज चुराती है॥

इन दिनों समंदर में गहरे,
इच्छाएं गोते खाती हैं।
लाती हैं मोती माणक चुन,
धनवान बनी इठलाती हैं॥
मैं लिपटा सजधज में रहता,
दरबारे शाही में नृप-सा।
और खड़ी बगल में प्यारी-सी,
एक दासी चंवर ढुलाती है॥
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उडता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतरकर नजरों में,
दिल मेरा रोज चुराती है॥

जब झूला बनकर आरजूएं,
बाँहों में मुझे झुलाती हैं।
अभिलाषाएं तब रग-रग में,
मुझको भी साथ बहाती हैं॥
मैं सुध-बुध खोया सा अचेत,
सुख के बिस्तर पर होता हूँ।
ख्वाबों में कभी टहलता हूँ,
और कभी नींद लग जाती है॥
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतार पर नजरों में,
दिल मेरा रोज चुराती है॥

उठता है ज्वार समुंदर में,
मन का तट तोड़ निकलता है।
कोमल कलिका का चंचलपन,
जब रंग ‘अनन्त’ बदलता है॥
हो जाती क्रूर तमन्नाएं,
जख्मी दिल को कर देती है।
क्वारेपन की गंगा मेरी,
मुँह मेरा बहुत चिढ़ाती है॥
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतर कर नजरों में,
दिल मेरा रोज चुराती है॥

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