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तुम्हारे बिना कैसे बीता साल,किसे सुनाएं दिल का हाल…

कीर्ति राणा
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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वही चौराहे,वही गलियां,वही संगीत की महफिलें,वही भंडारे,वही भजन संध्या के आयोजन,वही शादी समारोह, शवयात्रा-उठावने,चाय की चर्चा वाले वही सारे ठीये और वही शहर…। बस कमी है तो इस शहर की पहचान बन चुके महेंद्र बापना ‘बापू’ की। एक साल बीत गया….।
११ फरवरी २०१९ सोमवार की उस ढलती शाम जब फोन पर खबर मिली तो पहले विश्वास ही नहीं हुआ…मन कह रहा था हल्की-फुल्की चोंट लगी होगी,सब ठीक हो जाएगा लेकिन लंबे समय से पत्रकारिता करते-करते दिमाग में जो कीड़ा कुलबुला रहा था वह आगाह कर रहा था मामला इतना सहज नहीं है। वहां आँसू से भीगे चेहरे और छाई हुई चुप्पी देखते ही समझ आ गया कि बापू अब नहीं लौटने वाला। मन में यह भी शंका थी कि किसी ने योजना बना कर तो गाड़ी नहीं चढ़ा दी,उसी रात घटना स्थल पर भी मित्रों के साथ गए। बैंक पर तैनात सुरक्षाकर्मी से जानकारी ली,पूरा दृश्य पुनः रचा भी,तब मानना पड़ा कि बहाना बना कर ही मौत आई। ऐसा ही होता है जब कोई अपना अचानक इस तरह चला जाता है….रोना चाहें तो न आँसू निकलते हैं और न ही रुलाई,अंदर ही अंदर रोना शायद इसे ही कहते होंगे। चौबीस घंटे में घर से ज्यादा उसका वक्त तो खबर और शहर के अपने यार-दोस्तों के सुख-दु:ख में बीतता था। कार पत्नी और बेटी चलाना जानती है,उसके लिए तो दोपहिया ही सबसे भरोसेमंद थी।
जाने कैसे पता चल जाती थी बापू को अपने मित्रों की परेशानियां,बिना कहे-सुने सबकी मदद के लिए दौड़ पड़ने की आदत तो ऐसी थी कि इस एक साल में शायद ही कोई दिन बिना याद किए बीता हो। विवाह समारोह- उठावने-शोक बैठक आदि में शहर के जो गिने-चुने पत्रकार हर जगह नजर आते रहे हैं,उसमें बापू की मौजूदगी का मतलब होता था शहर का पूरा मीडिया जगत शामिल हो गया।
मन समझाने को कहते हैं कि आँसू जब सूख जाते हैं तो जुदा हुए परिजन का दु:ख धीरे-धीरे कम होता जाता है। शहर के जितने भी लोग महेंद्र बापना को जानते हैं,उन सबकी आँखों के आँसू भले ही सूख गए,लेकिन दिल तो हर दिन रोता है। ईश्वर ने क्या सोच कर उठा लिया हमारे बीच से हमारे यार को।
शहर में पत्रकार तो होते रहेंगे,लेकिन बापू जैसा शायद ही कोई दूसरा हो। शहर का शायद ही कोई चौराहा,प्रमुख बाजार हो जहां से गुजरते हुए बापू की याद ना आती हो। कहने को वो अग्निबाण के नगर प्रमुख थे,लेकिन सारा शहर उनका था,घर से ज्यादा वक्त तो चौराहों पर चाय चर्चा में गुजरता था।
सूचना मिलने पर पुलिस-फायर ब्रिगेड को पहुंचने में देर हो सकती है,लेकिन बापू को चाहे दोपहर में या आधी रात में फोन किया तो कुछ देर बाद तो वह आ ही जाते थे। यारी निभाना-रिश्तों को निभाना बापू से ही सीखा जा सकता है। एक पत्रकार कब बड़ा भाई,दोस्त बन कर घर के बाकी सदस्यों से अधिक विश्वसनीय हो गया था,इसे महसूस किया है इस एक साल में हर दिन,हर पल।
बापू क्या तुम्हें पता था कि कर्म का धर्म निभाने का वक्त कम है तुम्हारे पास ? क्या इसीलिए इतनी मुहब्बत लुटाते रहे, तुम क्या गए हम तो बेसहारा ही हो गए। किसको सुनाएं हाल इस रोते हुए दिल का। जिसे सुनाने जाते हैं,वह खुद तुम्हारी बातें-किस्से सुनाने लग जाता है। तब अहसास होता है कि तुम मेरी तरह ही न जाने कितने असंख्य लोगों के दिल के करीब थे।
तुम तो एक हसीन सपना थे,सपना ऐसे टूट जाएगा,कभी सोचा नहीं था। मौत इतनी क्रूरता से तुम्हारे साथ पेश आएगी आज तक भरोसा नहीं होता। तुम नाकोड़ा भैरव के भक्त,सुंदर कांड-हनुमान के सेवक,खजराना गणेश के भक्त,महाकाल के गुण गायक। कालों के काल महाकाल ने क्यों नहीं की तुम्हारी रक्षा,बापू हमारा तो पुनर्जन्म में भरोसा इसलिए भी है कि ऐसा न होता तो तुम हमारे नहीं होते। अब भरोसा है कि अगले जन्म में फिर तुम साथ रहोगे, पर ये तो बता दो अभी जो हर दिन,हर पल तुम्हारी कमी खलती है,उसकी भरपाई कैसे करें…।

परिचय-पत्रकारिता जगत में स्थापित और प्रतिष्ठित नाम मिलनसार पत्रकार कीर्ति राणा का है। क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री राणा लंबे समय तक बड़े दैनिक अखबार में समूह के विभिन्न संस्करणों में संपादक रहे तो अन्य समूह में भी शुरुआती सम्पादक रहे हैं। आपका निवास फिलहाल इंदौर(मध्यप्रदेश)में ही है। वर्तमान में दैनिक अखबार में इंदौर के सम्पादक हैं। आप राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं,जबकि सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी इनकी पहचान है। आप सोशल साइट पर भी लेखन में काफी सक्रिय हैं। यही नहीं,कविता रचते हैं,और पाठ भी करते हैं। श्रेष्ठ पत्रकारिता लिए आपको कई बार पुरस्कृत-सम्मानित भी किया जा चुका है।

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