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मानव और मानवता आज के युग में

कविता जयेश पनोत
ठाणे(महाराष्ट्र)
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जीवन के हर पल-पल पर,
समय नया रंग ला रहा है
आज के इस कलयुग में,
मानव पिछड़ता जा रहा है।
समय के इस परिवर्तन में,
सब-कुछ बदलता जा रहा है
संस्कृति के साथ जुड़ा वो अटूट रिश्ता,
जो मानवता का प्रतीक था,
अंधविश्वास की डोर में बंधकर,
उलझता जा रहा है।
समय के परिवर्तन के साथ,
सब-कुछ बदलता जा रहा है
वो धर्म,वो विचार,
मानव का मानव के प्रति व्यवहार।
बचा नहीं अब कुछ जीवन में,
अब करुणा और शिष्टाचार
हर जगह फैला हुआ है,
स्वार्थ,ईर्ष्या,द्वेष और लूटमार का व्यापार।
कहीं भी नहीं शान्ति,
हर जगह फैल रही अशान्ति
मन में भी विचारों की क्रान्ति,
हाय इस जगत के अनमोल रत्न को
किसने मेला कर डाला,
इसके भीतर की मानवता को
किसने कुचल डाला ?
हाँ,वही इसके मन में बैठा स्वार्थ है,
जिसने पलट डाली मानवता की काया
इसी स्वार्थ ने मानव को,
हिंसक,दानव समान बनाया
मानवता को कुचल कर,
मानवता का मान घटाया।
तो आज हम ये प्रण लें,
स्वार्थ से नाता तोड़ कर
फिर से मानवता को,
नए सिरे से जन्म दें॥

परिचयकविता जयेश पनोत का बसेरा महाराष्ट्र राज्य के मुम्बई स्थित खारकर अली रोड पर है। १ फरवरी १९८४ को क्षिप्रा (देवास-मप्र)में जन्मीं कविता का स्थाई निवास मुम्बई ही है। आपको हिन्दी,इंग्लिश, गुजराती सहित मालवी भाषा का ज्ञान भी है। जिला-ठाणे वासी कविता पनोत ने बीएससी (नर्सिंग-इंदौर,म.प्र.)की शिक्षा हासिल की है। आपका कार्य क्षेत्र-नर्स एवं नर्सिंग प्राध्यापक का रहा,जबकि वर्तमान में गृहिणी हैं। लेखन विधा-कविता एवं किसी भी विषय पर आलेखन है। १९९७ से लेखन में रत कविता पनोत की रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। फिलहाल स्वयं की किताब पर काम जारी है। श्रीमती पनोत के लेखन का उद्देश्य-इस रास्ते अपने-आपसे जुड़े रहना व हिन्दी साहित्य की सेवा करना है। इनकी दृष्टि में पसंदीदा हिन्दी लेखक,कोई एक नहीं, सब अपनी अलग विशेषता रखते हैं। लेखन से जन जागरूकता की पक्षधर कविता पनोत के देश और हिन्दी भाषा के प्रति विचार-
‘मैं भारत देश की बेटी हूँ,
हिन्दी मेरी राष्ट्र भाषा
हिन्दी मेरी मातृ भाषा,
हिन्द प्रचारक बन चलो,
कुछ सहयोग हम भी बाँटें।