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बची है थोड़ी-सी जिंदगानी

संजय गुप्ता  ‘देवेश’ 
उदयपुर(राजस्थान)

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गुजरी है एक लम्बी उम्र,
अब और मत कर धोखा
देख ले अपनी जिंदगी के,
करमों का लेखा-जोखा।

जमा पे नज़र डाल
कर अपने से सवाल
कभी आया मन में ख्याल,
इस मद में कितना जमा किया पुण्य
या नम्बर लिखा है शून्य,
दूसरा कालम तेरे खर्चे का
तेरे पापों के चर्चे का,
इन्सान बना रहा किस दर्जे का ?

बड़ों का ज्ञान है तजुर्बे का,
दोनों तरफ का क्या तेरा है योग
माइनस आया तो,
करमों का फल भोग।

अब पछताय होत क्या,
जब चिड़िया चुग गई खेत
समय सारा बीत गया,
कर गया मटियामेट।

जाने इस सांसारिक भूल-भूलैया में,
अपना जो था
चढ़ गया भेंट,
अपनों के चक्कर में
अच्छे परायों को भी भूला,
अपने-अपनों ने ही
तेरी आँखों में झोंका धूला,
अपने कर्मों से ही
तू रहा सदा फूला,
घमंड में झूला
हँसता रहा लोगों को रूला-रूला।

पर अभी खत्म नही हुई कहानी,
चाहे रूठ रही हो जवानी
बची है थोड़ी-सी जिंदगानी,
फेंक दे चादर जो अभी तक है तानी
बची जिंदगानी के थोड़े पल,
संवार सकते गुजरे औ’ आने वाले कल
बस उपर वाले में खुद को रमा ले,
दीनों की सेवा में ये पल बिता ले।

जो हुआ वह भूल जा,
अपनी झोली में कुछ तो कमा ले
कर दे न्यौछावर उसकी भक्ति में,
चरणों में जगह ले उसकी शक्ति में
बची जिंदगानी के थोड़े पल,
सहायक होंगे तेरी मुक्ति में।

शायद दबा दिया मैंने तेरी दुखती में,
आत्मा जगाई जिंदगी रूकती में
बची जिंदगी में खुद को तार ले।
प्रभु के चरणों के लिए,
खुद को संवार ले॥

परिचय–संजय गुप्ता साहित्यिक दुनिया में उपनाम ‘देवेश’ से जाने जाते हैं। जन्म तारीख ३० जनवरी १९६३ और जन्म स्थान-उदयपुर(राजस्थान)है। वर्तमान में उदयपुर में ही स्थाई निवास है। अभियांत्रिकी में स्नातक श्री गुप्ता का कार्यक्षेत्र ताँबा संस्थान रहा (सेवानिवृत्त)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप समाज के कार्यों में हिस्सा लेने के साथ ही गैर शासकीय संगठन से भी जुड़े हैं। लेखन विधा-कविता,मुक्तक एवं कहानी है। देवेश की रचनाओं का प्रकाशन संस्थान की पत्रिका में हुआ है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जिंदगी के ५५ सालों के अनुभवों को लेखन के माध्यम से हिंदी भाषा में बौद्धिक लोगों हेतु प्रस्तुत करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-तुलसीदास,कालिदास,प्रेमचंद और गुलजार हैं। समसामयिक विषयों पर कविता से विश्लेषण में आपकी विशेषज्ञता है। ऐसे ही भाषा ज्ञानहिंदी तथा आंगल का है। इनकी रुचि-पठन एवं लेखन में है।