निष्प्राण करें हम ‘कोरोना’
ओम अग्रवाल ‘बबुआ’ मुंबई(महाराष्ट्र) ****************************************************************** मानवता पर जब जब कोई,ऐसी आफत आई, खुद ही खुद को डसती मानों,अपनी ही परछाई। भरी दुपहरी में सूरज को,मानो निगल गई रजनी, और भोर के हाथों से यूँ,गुपचुप फिसल गई रजनी। कोरोना के संकट को कुछ, सहज समझना ठीक नहीं। सही गलत की परिभाषा में, सहज उलझना ठीक नहीं।। … Read more