Visitors Views 7

अमेरिका और चीन की नूरा कुश्ती का दुष्परिणाम ‘कोरोना’ का दंश!

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
*****************************************************
हमारे यहाँ एक कहावत है कि दो सांडों की लड़ाई में खेत की बिरवाई का नुकसान होता है। यही दोस्ती सत्कार्य में हो तो उस जैसा सुख नहीं। और यदि दोस्तों की दुश्मनी से उनका खुद नुकसान होता है,तो उनका दुष्प्रभाव अन्यों को भी भोगना होता है। चीन और अमेरिका प्रभुत्व की लड़ाई में एक-दूसरे को नीचा दिखाने में बाज़ नहीं आते,जबकि इतने बुद्धिजीवी कहलाते हैं,पर मानवीय गुणों से विहीन हैं। उसका कारण उनकी सोच, उनका आहार,उनकी संकीर्ण वृत्तियां हैं। पता नहीं इतने सम्पन्न होने के बावजूद उनमें सीमा नहीं,संयम नहीं,एक-दूसरे के प्रति आदर नहीं, बस अहंकार,तृष्णा,अस्तित्व की लड़ाई में दिन-रात बैचेन है। एक पद सब क्षणिक है, और पद पर रहते हुए सत्कर्म याद रखे जाते हैं,अन्यथा इस जमीं पर अच्छे-अच्छे सूरमा दफ़न हो गए और हो जाएंगे,जिनको कोई पूछने वाला नहीं रहता है।
जो बात सामने आई है कि,’कोरोना’ विषाणु को बनाने में अमेरिका ने चीन को शोध करने के लिए २९ करोड़ रुपए यानी ३.७ मिलियन डालर की आर्थिक मदद की है,ताकि वो इस बात पर शोध कर सके कि,क्या कोरोना का विषाणु गुफाओं में रहने वाले चमगादड़ की वजह से फैला। वैज्ञानिक मानते हैं कि, चमगादड़ के जरिए ही कोरोना का संक्रमण इंसानों के शरीर में आया है। वहां के माँस बाजार में यह संक्रमण चमगादड़ द्वारा आया और फिर पूरे विश्व में फ़ैल गया। इस बात की पुष्टि भी हो रही है कि,यह संक्रमण चीन की प्रयोगशाला से हुआ है। जिस प्रयोगशाला में जानवरों पर भारी अत्याचार होते हैं,उसके लिए अमेरिका ने क्यों धन दिया ? इस बात की पुष्टि से यह सिद्ध हो चुका है कि,यह मानव कृत्य त्रासदी है और इससे होने वाली हिंसा का फल सबको भोगना होगा, जिन्होंने इसमें भागीदारी निभाई है॥
यदि हम ईश्वरवादी और कर्म सिद्धांत पर भरोसा रखते हैं,तो इसका जरूर कहर इन नेताओं पर जरूर पड़ेगा। यह कृत्य किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।