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आज मिठाई में वह स्वाद नहीं…

डॉ.अर्चना मिश्रा शुक्ला
कानपुर (उत्तरप्रदेश)
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मकर सक्रांति स्पर्द्धा विशेष….

यह बात आज से पच्चीस-तीस साल पहले की है। हम सब त्यौहारों पर अपने अम्मा-बाबूजी के साथ गाँव जाया करते थे। वहाँ दादी-बाबा के पास त्यौहार मनाने का मजा ही कुछ और होता था। वहाँ हम बच्चों का दुलार,प्यार और हुडदंग दादी-बाबा को भी बहुत अच्छा लगता था। मकर संक्रांति यानी खिचड़ी का त्यौहार वहाँ कुछ खास ही होता था। खिचड़ी से एक दिन पहले तेलइयां यानी पूड़ी, सब्जी,दही-बड़े,मुंगौड़े तेल में डूबा हर खाना। खाना भी बड़े पैमाने में,जिसके लिए आटा गूंथने व बड़े मुंगौड़े की दाल पीसने रात को गनेश कक्का आया करते थे। उनसे हम लोग खूब बतियाते और यह भी कहते कि,ये औरतों वाला काम कक्का आप क्यों करते हो। वह हँसते और तल्लीनता से दाल पीसते रहते तथा अम्मा को भौजी-भौजी कहते हुए बातें भी करते जाते। तेलइयां वाली शाम को या रात में ज्यादा मात्रा में खोए की बर्फी जमाई जाती, पेड़ा और रसगुल्ले भी बनाए जाते। अब हम सब छोटे-बड़ों की निगाहें मिठाई पर ही टिकी रहती। खिचड़ी वाले दिन हम सब यमुना जी पैदल ही दौड़ते-भागते नहाने जाते,वहीं रेत से शंकर जी का मन्दिर बनाते। सरसों के पीले फूल,मूली के सफेद फूल उन पर चढ़ाते और यमुना जल भी। यमुना जल लेकर आते, तो उससे रास्ते वाले बरमदेव (ब्रम्हदेव)पर जल चढ़ाते घर आने पर दादी-बाबा भी उस जल को डालकर नहाते। बाबा के नहाते ही हम लोगों का इंतजार खत्म हो जाता। वहाँ पर मिठाई बाँटने का अंदाज ही कुछ और था। एक व्यक्ति दौड़कर तराजू लाए और पावभर का बाट। घर के वह छोटे बच्चे जो खा भी नहीं सकते,उनका भी एक पाव मिठाई का हिस्सा लगता। सबसे पहले एक पाव मिठाई और खिचड़ी ड्यारा बाबा(वहाँ स्थित मन्दिर)के यहाँ भेजी जाती। बाबा के मातहतों को विशेष प्यार और सम्मान से जिसमें गनेश कक्का,बिन्दाबन बाबा ,रामसरन,सिरोमन,पुन्ना बाबा,कुसमा बुआ,डोमारिन, कुम्हारिन,तेलिनइन सबकी लम्बी कतार थी,जिनको तराजू से तौलकर सबका हिस्सा निकाला जाता। परिवार के सभी बहू,बेटों,बेटियों,नाती,पोतों तथा बची हुई मिठाई मिट्टी के बड़े करवा में भरकर बाबा की अलमारी में रखी जाती। अब हम सब मिठाई और खिचड़ी खाकर मेला देखने के लिए तैयार होते। खिचड़ी का मेला देखने आस-पास के गाँव के लोग-रिश्तेदार भी आते। खिचड़ी के मेला के लिए हर बड़ा व्यक्ति अपने से छोटे को कुछ रुपए देता,इस तरह हम लोगों के पास काफी रुपए इकट्‌ठे हो जाते और हम सभी मेला देखने जाते। बाबा बैलगाड़ी व सग्गड़(छोटी-सी बैलगाड़ी) से हम लोगों को मेला देखने भेजते,लेकिन हम सब बच्चे उसे रोक-रोक कर उतरते-चढ़ते मौज-मस्ती करते मेला पहुँच जाते।

आज इतनी साधन सम्पन्नता और बाजार होने पर भी मिठाई में वह स्वाद नहीं मिलता, वह छुटपन वाला बाजार नहीं मिलता,वह चाव और लगाव नहीं मिलता। आज हम अपनी आने वाली पीढ़ी को वह नहीं दे पा रहे,जो हमने पाया था। आज भी खुशियों के साथ त्यौहार मनाते हैं,लेकिन अपना छूटा हुआ वह बचपन याद आ ही जाता है।

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