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इक्कीस दिन…

सुनील चौरसिया ‘सावन’
काशी(उत्तरप्रदेश)

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अमवा बाजार गाँव को एक फुलवारी ही समझिए,जिसमें सभी रूप-रंगों और सुगंधों के पुष्प खिले हुए हैं। इन पुष्पों में एक पुष्प है ‘माधुरी’ जो विधवा है। उसकी बड़ी बेटी मधु अभी छह वर्ष की ही है,लेकिन माँ की मजबूरियों को समझती है। वह अपने छोटे भाई मुन्नू को गोद में बिठाकर समझाती है कि वह माँ को परेशान ना करे। मजदूरी करके जब माधुरी लौटती है तब उसके भूखे बच्चे चहक उठते हैं। मालकिन की कृपा से जो रुखी-सूखी रोटियां मिली होती हैं,उन्हें ही खाकर वे रात गुजारते हैं। छोटा भाई कई बार तरकारी के लिए घर में कोहराम मचा देता है। तब बेबस माधुरी गुस्साकर एक-दो थप्पड़ जड़ देती है। बेचारी मधु,मुन्नू को किनारे ले जाती है और चुप कराकर प्यार से नमक लगाकर रोटी खिला देती है।
जब दोनों बच्चे सो जाते हैं,तब उनकी ओर देखते हुए चाँदनी रात में वह यही सोचती है,…”अगर मालकिन उसको अपने घर में बर्तन धोने का काम नहीं देती तो उसके दिन कैसे कटते…! ”
कई बार उसकी तबीयत खराब हो जाती है,तब मालकिन खुद उसकी झोपड़ी में आती है। हालचाल पूछती हैं और दवा-दारु देकर बच्चों को खिला-पिलाकर जाती हैं। भगवान किसी को यदि धन दे,तो ऐसा ही पावन मन भी दें। धनवान वह नहीं है,जो धन का धनी है। अपितु ,धनवान वह है,जो मन का धनी है।
वह पूर्णिमा की चाँदनी में लेटे-लेटे सोचती है,…”हे भगवान! काश दुनिया का हर इंसान उसकी मालकिन की तरह विशाल हृदय वाला होता,जो गरीबों को भी दुर्दिन में गले लगाता।”
४ वर्ष पूर्व जब उसके पति का स्वर्गवास हुआ,तब तो वह बिल्कुल टूट चुकी थी। जिंदगी बिलख रही थी। इस बहते हुए दरिया का न कोई सहारा था,न कोई किनारा ।
आज भी माधुरी का जीवन एकदम निराधार है। न गाँव में घर है,न शहर में खेत… उसकी जिंदगी है तपती हुई रेत। मालकिन ने प्रेम बरसा कर उसके जीवन को मधुमय कर दिया। आज यदि वह कभी-कभी मुस्कुराती है,तो उन्हीं की कृपा से। उसके फूल से बच्चे भी खिलखिलाते हैं,तो उन्हीं की कृपा से। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि मधु बेटी और मुन्नू बेटा को वही पढ़ाएंगी और एक समय आएगा कि माधुरी के जीवन का सारा दु:ख-दर्द हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।
कभी-कभी माधुरी अपने स्मृतिशेष पति को याद करती है,तब दोनों कपोल अश्रु वर्षा से नहा जाते हैं। माँ की तरह मालकिन उसके सिर पर हाथ फेरती हैं और समझा-बुझाकर तन-मन में धधकती हुई विरहाग्नि को बुझाती हैं और कहती हैं-“संतोषम् परम् सुखम्।” जब जीवन में दु:ख की घड़ी आए,तब निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि अर्धरात्रि की दुखद कालिमा के बाद ही भोर की सुखद लालिमा का शुभागमन होता है। माँ-बेटी जस इस सरस रिश्ते को देखकर अक्सर पड़ोसियों को जलन होती है,लेकिन जहां सच्चा प्रेम होता है,वहां दुनिया की तानेबाजी और जलन खुद ही जलकर स्वाहा हो जाते हैं।
मधु बिटिया शाला से घर की ओर चल पड़ी। साथियों के साथ खुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी। खुश तो होना ही था, एकाएक इतनी लंबी छुट्टी जो हो गई थी। घर में घुसते ही उसने बोला-“मम्मी-मम्मी! आज से हम सब खूब मस्ती करेंगे।
‘क्यों ?’ उदास माँ ने धीरे से पूछा।
“क्योंकि,’कोरोना’ विषाणु के कारण हमारे विद्यालय में लंबी छुट्टी हो गई है। अब तो मौज ही मौज है माँ।”
चहकती हुई मधु माँ को उदास देख कर चौंक गई-‘माँ! तुम इतनी उदास क्यों हो ?’
माँ ने कहा,-“तुम नहीं समझोगी मधु।”
बालहठ से अजीज आकर बताना ही पड़ा,-“बेटी! कोरोना एक वैश्विक महामारी है, जिसके आगे एक से बढ़कर एक शक्तिशाली देश ने अपने घुटने टेक दिए हैं। सबसे गंभीर समस्या यह है कि इस बीमारी का कोई इलाज भी नहीं है। अब तक हजारों लोग कोरोना विषाणु की चपेट में आकर तड़प-तड़प कर प्राण त्याग चुके हैं।”
आश्चर्यचकित मधु ने पूछा,-“तब इस कोरोना वायरस से बचने का क्या उपाय है माँ ?”
माँ ने बेटी की जिज्ञासा को शान्त किया,-“इससे बचने के उपाय हैं-संयम,संकल्प और सावधानी। इसलिए हमारे प्रधानमंत्री ने संपूर्ण भारत वर्ष में संपूर्ण ‘तालाबंदी’ का ऐलान किया है। २२ मार्च २०२० को तो अपने देश में जनता कर्फ्यू भी लगा था।”
मधु ने तालाबन्दी और कर्फ्यू के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की।
माधुरी ने बताया,”कोरोना वायरस के प्रकोप से बचने के लिए एक-दूजे के बीच में कम से कम १ मीटर की दूरी आवश्यक है। इसीलिए संकट की घड़ी में सरकार कर्फ्यू या तालाबंदी करती है। कर्फ्यू लगने पर हम घर से बाहर बिल्कुल नहीं निकल सकते हैं,जबकि तालाबंदी में जरूरी सामान जैसे-सब्जी,दवा इत्यादि के लिए घर से बाहर निकला जा सकता है।”
“माँ! यह कोरोना बहुत ही शरारती है। क्या हमारे घर में भी आ सकता है ?”- कोरोना के नाम से डरे हुए मुन्नू ने जब इतना भयानक प्रश्न पूछा,तब माँ ने उसे गोद में बिठाते हुए समझाया-“नहीं बेटा। कोरोना बहुत ही स्वाभिमानी और सज्जन विषाणु है। यह बिन बुलाए हमारे घरों में नहीं आता है। जब कोई व्यक्ति असावधानी से बाहर जाता है तब वह उसके साथ उसके घर में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे आसपास के सभी लोगों को अपनी चपेट में ले लेता है। इसलिए तुम लोग घर में ही खेलो और अपनी पढ़ाई-लिखाई करो।”
माधुरी,रोज सुबह-शाम बर्तन धोने के लिए मालकिन के घर जाती है। आज ज्यों ही काम के लिए दरवाजे तक पहुंची कि मधु माँ के आँचल को पकड़कर जिद करने लगी कि “प्रधानमंत्री ने कहा है कि घर की लक्ष्मण रेखा को पार करने पर बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। २१ दिन तक घर में ही रहो। बाहर निकलने का मतलब परिवार को इक्कीस साल तक पीछे धकेलना है।”
मजबूर और मजदूर माँ ने बिटिया को समझाया कि यदि वह काम नहीं करेगी तो खाएगी क्या। बर्तन धोती है तभी तो बदले में दो रोटियां मिलती हैं। अंततः
तालाबंदी होने के बाद भी उस मजबूर- मजदूर माँ को लक्ष्मण रेखा पार करनी ही पड़ी। शाम के समय अमवा बाजार गाँव की जिस सड़क पर पाँव रखने के लिए जगह नहीं रहती है,वहां सन्नाटा पसरा था। उस सन्नाटे को चीरते हुए मालकिन के दर पर पहुंची तो दरवाजा अंदर से बंद था। तीन-चार बार खटखटाने के बाद अंदर से मालकिन की आवाज आई,-“माधुरी! आज के बाद हम लोग खुद ही बर्तन धो लेंगे। जब तक कोरोना विषाणु का कहर है,तब तक हमारे घर में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है। तुम अपने बाल-बच्चों के साथ अपने घर में ही कैद रहो। माधुरी! बुरा मत मानना। आज तुम्हें वापस जाना होगा,क्योंकि आज खतरों से हमें कोई खतरा नहीं है। आज तो हर इंसान को हर इंसान से खतरा है।”
“वाह रे कोरोना! मालकिन ने कभी भी ऐसे खाली हाथ वापस नहीं लौट आया था। आज खाली हाथ वापस जाऊंगी तो बच्चों को क्या खिलाऊंगी….।” यही सोचते हुए घर की ओर चल पड़ी। आँखें नम थी,मन भारी था। जी करता था बैठकर रो ले। सोच रही थी,..कहीं किसी दुकान पर कोई काम कर लेगी तो दो- चार पैसे मिल जाएंगे और बच्चों की भूख मिट सकेगी। वह तो पानी पीकर भी सो जाएगी। कम से कम बच्चों के लिए तो दो कोर रोटी का जुगाड़ हो जाए,लेकिन काम करे तो करे कहां ? सारी दुकानें बंद,सारी गलियां बंद,सभी घरों के दरवाजे बंद…। विचारों के इसी भंवर जाल में फंसी थी तब तक एक पुलिसवाले ने धमकाया,-“अरे! तुम्हें मरना है क्या कोरोना से ? जल्दी घर के भीतर जाओ वरना लाठियां बरसेंगी ?”
रोज की भांति आज भी बच्चे माँ के पास दौड़ते हुए आए,लेकिन आज माँ उदास थी और उसके हाथ खाली थे।
भूखे बच्चों के सूखे हुए होंठों को देखकर विधवा माधुरी का कलेजा फट गया। मधु समझदार थी,मजबूरी को समझ गयी। उसने अनुज मुन्नू को समझाया,-“कोई बात नहीं,एक दिन हम लोग बिना कुछ खाए सो जाएंगे तो मर नहीं जाएंगे,मत रोओ मुन्नू।”, लेकिन नासमझ मुन्नू पैर पटक-पटक कर रोता रहा…।
बेबस माँ ने कलेजे पर पत्थर रखकर खुद पानी पिया और मधु को भी पिलाया। भूख से तड़पता हुए मन्नू ने पानी के गिलास पर ऐसी लात मारी कि गिलास छिटक कर दूर चला गया। सिसकती हुई माँ ने सोने का नाटक किया। फिर गुमसुम मधु भी पेट दबा कर सो गयी। रोते-रोते मुन्नू भी पता नहीं,कब सो गया। अंतर बस इतना था- माँ-बेटी पानी पीकर सोए और मुन्नू को आँसूओं के घूंट पी-पीकर सोना पड़ा। बात १ दिन की नहीं थी,२१ दिन की तालाबंदी की थी।
बच्चों की नजर में माँ माधुरी सो चुकी थी,लेकिन उसके मानस-मंदिर में कोरोना विषाणु रूपी मृत्यु तांडव नृत्य कर रही थी। वह करवटें बदलती रही… कि अर्धरात्रि में दरवाजा खटखटाने की आवाज आई..। बेचारी विधवा माधुरी तो डर के मारे सहम सी गई। आखिर इस रात में कौन दरवाजा खटखटा रहा है। सहमी-सी आवाज में दरवाजा खोले बिना अंदर से उसने पूछा,-‘जी,कौन ?’
“डरो मत माधुरी,दरवाजा खोलो।” मालकिन की आवाज सुनकर माधुरी अचरज में पड़ गई।
दरवाजा खोलते हुए उसने पूछा,-‘आप इतनी रात में….?’
“हाँ। तुम्हारी और बच्चों की बहुत याद आ रही थी। भला अपने लोग भूखे सो जाएं। हो नहीं सकता…।” एक मीटर दूर से ही बात करते हुए उन्होंने टिफिन उसके सामने रख दिया।
भूखे बच्चे मालकिन की आवाज सुनते ही प्रफुल्लित होकर उठ बैठे। साबुन से हाथ धोकर टिफिन खोलकर खुशी से झूमते हुए गरम-गरम रोटियां खाने लगे।
भाव विभोर माधुरी की आँखें नम थी। मालकिन ने मानो चारों धाम की यात्रा कर ली। प्रेम और करुणा के आगे कोरोना को झुकना पड़ा…।

परिचय : केन्द्रीय विद्यालय टेंगा वैली अरुणाचल प्रदेश में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक हिंदी एवं एसोसिएट एनसीसी अधिकारी पद पर सेवा प्रदान कर रहे सुनील चौरसिया ‘सावन’ की जन्मतिथि-५अगस्त १९९३ और जन्म स्थान-ग्राम अमवा बाजार(जिला-कुशी नगर, उप्र)है। कुशीनगर में हाईस्कूल तक की शिक्षा लेकर बी.ए.,एम.ए.(हिन्दी)सहित वाराणसी से बीएड भी किया है। इसके अलावा डिप्लोमा इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन,एनसीसी, स्काउट गाइड,एनएसएस आदि भी आपके नाम है। आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन,लेखन,गायन एवं मंचीय काव्यपाठ है,तो सामाजिक क्षेत्र में नर सेवा नारायण सेवा की दृष्टि से यथा सामर्थ्य समाजसेवा में सक्रिय हैं। लेखन विधा-कविता,कहानी,लघुकथा,गीत, संस्मरण,डायरी और निबन्ध आदि है। अन्य उपलब्धियों में स्वर्ण-रजत पदक विजेता हैं तो राष्ट्रीय एवं विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बैनर तले मॉरीशस, इंग्लैंड,दुबई,ओमान और आस्ट्रेलिया आदि सोलह देशों के साहित्यकारों एवं सम्माननीय विदूषियों-विद्वानों के साथ काव्यपाठ एवं विचार विमर्श शामिल है। एक मासिक पत्रिका के उप-सम्पादक भी हैं। लेखन का उद्देश्य ज्ञान की गंगा बहाते हुए मुरझाए हुए जीवन को कुसुम-सा खिलाना,सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार कर सकारात्मक सोच को पल्लवित-पुष्पित करना,स्वान्त:सुखाय एवं लोक कल्याण करना है। श्री चौरसिया की रचनाएँ कई समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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