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लोक बोलियां भारत माता की आवाज

उज्जैन(मप्र)।

हमारी बोलियां संरक्षित नहीं रहेगी तो संस्कृति का पतन होगा। बोलियां ही संस्कृति को संरक्षित करती है। लोक बोली और मातृभाषा के लिए जो लोग कार्य कर रहे हैं,उनको प्रोत्साहन मिलना चाहिए,शासन और समाज दोनों को सहयोग करना चाहिए। माँ और मातृभाषा का सम्मान हमेशा करना चाहिए। मातृभाषा को अपनाना भी स्वदेशी का संकल्प है।
यह बात स्वस्तिक पीठाधीश्वर संत डॉ. अवधेशपुरी महाराज ने संवाद शोध संस्थान (उज्जैन) के तत्वावधान में ‘शिक्षक दिवस’ पर आयोजित लोक संवाद मंच के उद्घाटन अवसर पर नीलगंगा स्थित श्री धाम पर कही।
अध्यक्षता कर रहे विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने कहा कि,लोक बोलियों को जो प्रोत्साहन देते हैं,वो सच्चे अर्थों में भाषा के लिए कार्य कर रहे हैं। बोलियां और उप-बोलियां एक जगह होगी तो ही नई शिक्षा नीति सफल होगी। मातृभाषा में शिक्षण सामग्री के लिए काम करना होगा। ऐसे समय में जो काम संवाद शोध संस्थान कर रहा है,वह सराहनीय है। आपने कहा कि, भारत माता लोकवाणी को सुनती है। हिंदी से पहले जनजातिय भाषा को महत्व देना होगा। संस्कृति भाषा से संरक्षित होती है, साहित्य से प्रसारित होती है।
इस अवसर पर संस्था द्वारा समाज और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा देने के लिए परमहंस डॉ. अवधेशपुरी महाराज,डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा,डॉ. श्रीकृष्ण जोशी, राधेश्याम शर्मा,वैद्य संत मनोहर रावल का सारस्वत सम्मान किया गया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में सरस्वती वंदना सुनीता राठौर ने प्रस्तुत की। स्वागत उद्बोधन अनिल पांचाल ने दिया। संस्था के कार्यकलापों का परिचय उपाध्यक्ष संदीप ‘सृजन’ ने दिया। संचालन संस्था अध्यक्ष डॉ. राजेश रावल सुशील ने किया।
इस अवसर पर लोकभाषा केन्द्रित मासिक काव्य गोष्ठी की शुरुआत की गई। गोष्ठी में कवि डॉ. विक्रम विवेक, राजेन्द्र जैन,अनिल पांचाल,सुरेन्द्र सत्संगी,डॉ. मोहन बैरागी,गौरी शंकर उपाध्याय और अक्षय चवरे सहित आरती पांचाल,अनिता सोहनी आदि ने रचना पाठ किया। संचालन हाकम पांचाल ‘अनुज’ ने किया। आभार गौरीशंकर उपाध्याय उदय ने व्यक्त किया।
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