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‘न्याय’ के नाम पर ठगी क्यों ?

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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जोधपुर के एक समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और भारत के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबड़े ने टिप्पणियाँ की हैं। श्री बोबड़े ने यह ठीक ही कहा है कि,न्याय न्याय है,वह प्रतिशोध या बदला नहीं हो सकता है। इसीलिए,किसी भी व्यक्ति का अपराध सिद्ध होने के पहले गुस्से में आकर उसको सजा दे देना उचित नहीं है। यही ठीक हो तो फिर देश में अदालतों की जरुरत ही क्या है ? लोग अपने-आप ‘न्याय’ करने लगेंगे। ऐसा न्याय समाज में अराजकता फैला देगा,लेकिन न्याय मिलने में सालों-साल लग जाएं और हजारों-लाखों रु. खर्च हो जाएं तो क्या आप उसे न्याय कहेंगे ? जब खेती ही सूख जाए और फिर आप झमाझम बारिश ले आएं तो लोग आपको क्या कहेंगे ? ‘का बरखा,जब कृषि सुखानी ?’ हमारे देश में करोड़ों मुकदमे अधर में लटके रहते हैं। तीस-तीस चालीस-चालीस साल वे फैसलों का इंतजार करते रहते हैं। उन मुकदमों के जज सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। उनके वादी,प्रतिवादी और वकील दिवंगत हो जाते हैं। जो फैसले निचली अदालतें करती हैं,उनमें से कई ऊंची अदालतों में जाकर उलट जाते हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि अदालतों की बहसें और फैसले अंग्रेजी में होते हैं, जो वादी और प्रतिवादी के लिए जादू-टोने की तरह बने रहते हैं। न्याय के नाम पर यह ठगी आजादी के बाद भी देश में धड़ल्ले से चल रही है। भारत,पाकिस्तान,श्रीलंका,मालदीव,बांग्लादेश जैसे देशों में अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही इस ठगी को रोकने की हिम्मत आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं की है। इसके विरुद्ध राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बराबर आवाज उठा रहे हैं। उनकी पहल पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी वेबसाइट कई भारतीय भाषाओं में कर दी है। मुझे उन पर गर्व है। वे राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठकर भी अपने सिद्धांतों को नहीं भूले हैं। कोविंद जी ने जोधपुर में फिर कहा है कि न्याय को जरा सस्ता करो,सुलभ करो,गरीब आदमी की हैसियत ही नहीं होती कि वह मुकदमा लड़ सके। गरीब आदमी को जैसे मैं शिक्षा और इलाज मुफ्त देने की वकालता करता हूँ,वैसे ही उसे इन्साफ भी मुफ्त मिलना चाहिए। इन तीनों चीजों को जादू-टोने से बाहर निकालने का एक ही शुरुआती उपाय है। वह है,इनकी पढ़ाई के माध्यम से अंग्रेजी को निकाल बाहर किया जाए। यदि वकालत, चिकित्सकीय और शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं बन जाएं तो कुछ ही वर्षों में भारत महाशक्ति बन सकता है।

परिचय-डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।