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आजाद भारत में कितनी आत्मनिर्भर हैं महिलाएं!

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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लैंगिक समानता में भारत ११२ वें स्थान पर पहुंचा,जिनमें शिक्षा,स्वास्थ्यऔर राजनीतिक ताकत में महिलाओं के साथ भेदभाव ख़त्म होने में ९९ वर्ष लगेंगे,ये बात विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट २०२० में बताई गई हैl
देश को आजाद हुए सात दशक बीत चुके हैं। इन सात दशकों में भारत की अगर बात की जाए तो यहां आमूल-चूल परिवर्तन आए हैं। आज हम अंतरिक्ष में आत्मनिर्भर हो चुके हैं,रोजगार के साधनों का अभाव नहीं हैl शिक्षा,तकनीक,संचार,स्वास्थ्य,परिवहन आदि कमोबेश हर मामले में भारत की स्थिति सात दशकों में पहले से संतोषजनक मानी जा सकती है। एक मामले में आज भी देश में स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली है,और वह है महिलाओं की स्थिति। कहने को आज महिलाओं को पुरूष की बराबरी का दर्जा दे दिया गया है,पर यह बात महज कागजी ही प्रतीत होती है। हम अपने स्तर पर चाहे जितने भी सर्वेक्षण करवाकर अपनी पीठ ठोंक लें,पर जब वैश्विक स्तर पर सर्वेक्षण होते हैं तो हम बहुत नीचे वाली पायदान पर अपने-आपको पाते हैं। ये स्थिति चिंतानजक मानी जा सकती हैं। साड़ी,स्कर्ट,ब्लाऊज,सलवार-कमीज से निकलकर आज शर्ट और जींस में महिलाएं दिखने लगी हैं,पर यह उनके विकास का पैमाना कतई नहीं माना जा सकता है।
जब देश आजाद हुआ था,उस दौर में महिलाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय हुआ करती थी। महिलाओं को चारदीवारी के अंदर ही कैद रहने पर मजबूर होना पड़ता था। उस दौर में महिलाओं की वेशभूषा और आज की वेशभूषा में बहुत अंतर आ चुका है,पर आज भी समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाया है। अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल गया होता,तो जगह जगह सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षित जैसी इबारतें शायद नहीं लिखी गई होतीं। देश में महिलाओं की स्थिति क्या है! इस पर राष्ट्रव्यापी बहस की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। महानगरों सहित अन्य शहरों में क्या महिलाओं के लिए भयमुक्त वातावरण है,इसका जवाब नकारात्मक ही होगा। क्या कारण है कि आजाद भारत में सात दशक बाद भी हम महिलाओं के लिए ऐसा वातावरण तैयार करने में अक्षम ही रहे हैं। इसके पीछे पुरूष प्रधान की सोच ही प्रमुख रूप से बाधक बनकर सामने आती दिखती है। आज जरूरत समाज की उस सोच को बदलने की है,जिसमें यह बात प्रमुख रूप से उभारी गई है कि महिलाओं का मूल काम घर को संभालना है। पुरूष यह चाहता है कि महिलाएं कामकाजी बनें,पर दूसरी तरफ वह इस कुरीति से बाहर निकलने को तैयार नहीं दिखता है कि महिलाएं घर को भी संभालें। आज कितने घर ऐसे हैं,जहां घर में भोजन बनवाने,साफ-सफाई करने,बरतन साफ करने,झाडू-फटका,बच्चे संभालने के काम को पुरूष करते होंगे!
देश में महिलाओं के लिए शिक्षा और चिकित्सा जैसे व्यवसायों को ही मुफीद माना गया है। इसका कारण यह है कि इन कार्यों को महिलाओं द्वारा बहुत ही आसानी से किया जा सकता है,पर पुरूष प्रधान समाज की सोच ने कभी यह सोचा है कि इन कामों के अलावा महिलाओं को घर की साफ सफाई,बच्चों की जवाबदेही (मातृत्व),परिवार के लिए भोजन पकाना,घर की साफ-सफाई,बर्तन,कपड़े आदि के काम नहीं करने पड़ते हैं!
महिलाओं के इन हालातों की जानकारी देश के हुक्मरानों को न हो ऐसा संभव नहीं है। लगभग ४ साल पहले विश्व बैंक के द्वारा महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी जरूर यहां याद दिलाना चाहेंगे,जिसमें विश्व बैंक ने दो टूक कहा था कि देश में महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण के संबंध में चाहे जितने भी दावे कर लिए जाएं,पर यर्थात इससे उलट ही है। जमीनी हकीकत के लिहाज से बीसवीं सदी और इक्कीसवीं सदी में महिलाओं की स्थिति में बहुत ज्यादा अंतर नही आया है। पहले की तुलना में आज महिलाएं ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं,पर जब वे घर से बाहर कदम रखतीं हैं तो उनकी दुश्वारियां पहले की ही तरह हैं। आज भी घर से बाहर कदम रखने के लिए महिलाओं को माता-पिता,सास ससुर,भाई या पति की इजाजत की दरकार है।
देश पर चाहे जो भी सियासी दल हुकूमत करता आया हो,उसके द्वारा महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की सदा ही वकालत की गई है। देश की सबसे बड़ी पंचायत(लोकसभा) के ५४३ पंचों(संसद सदस्यों)ने क्या कभी यह पूछने की जहमत उठाई है कि,महिलाओं को बराबरी की बात सिर्फ कागजों पर ही क्यों की जाती है! आखिर क्या वजह है कि,महिला आरक्षण विधेयक सालों-साल से संसद की दहलीज पर सीढ़ियां चढ़ उतर रहा है!
विश्व बैंक द्वारा २०१६ में महिला करोबार एवं कानून नाम से जारी रिपोर्ट में इस बात को साफ भी किया है। इसमें कहा गया है कि महिलाओं द्वारा समाज के उत्थान में पूरा पूरा योगदान दिए जाने के बाद भी यह विडम्बना और अन्याय ही है कि,समाज उनकी क्षमता और अन्य बातों पर हर कदम पर पाबंदियां लगाता दिखता है। इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व के ढाई दर्जन देशों में महिलाओं को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि वे कहां रहना चाहतीं हैं। इतना ही नहीं,डेढ़ दर्जन से ज्यादा देशों में महिलाओं को कानूनन उनके पति के आदेश को मानने के लिए बाध्य किया गया है।
विश्व आर्थिक मंच (डब्लूईएफ) द्वारा जारी वार्षिक जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत की रैंकिंग विश्वभर में एक सैकड़ा (११२) के ऊपर है। इस रिपोर्ट पर अगर गौर किया जाए तो,यह कहती है कि विश्व में लिंगभेद तो कम हो रहा है पर महिलाओं और पुरूषों के बीच अनेक क्षेत्रों में भेदभाव अभी भी जस का तस ही दिख रहा है। आईसलैण्ड ही विश्व में इकलौता ऐसा देश माना जा सकता है,जहां महिलाओं के साथ किसी तरह का भेदभाव शायद ही होता हो।
देश में सरकारी स्तर पर `मातृत्व अवकाश` की व्यवस्था है। बच्चे के लालन-पालन के लिए वह २ साल का अवकाश बच्चे के बालिग होने तक ले सकती है। यह सब कुछ सरकारी व्यवस्थाओं में संभव है। निजी क्षेत्रों में प्रसव के लिए अवकाश बहुत ही सीमित होते हैं। इतना ही नहीं,छोटी कम्पनियों में नियोक्ताओं की भी यह मजबूरी होती है कि,वे इस तरह के अवकाश देने की स्थिति में नहीं रह जाते हैं। इसका नतीजा यही होता है कि छोटी कम्पनियों में काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व का सीधा अर्थ करियर से हाथ धोने से ही लगाया जाता है।
लगभग पैंतीस साल पहले एक नामी पत्रिका में लेखक द्वारा लिखी गई पंक्तियां आज भी जेहन में जस की तस ही अंकित हैं। उसमें लिखा गया था कि,समाज को अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है। हम दूसरी महिलाओं को गंदी नजर से देखते समय यह भूल जाते हैं कि हमारी माता-बहनें या घर की अन्य महिलाएं जब सड़कों पर निकलती हैं,तो वे दूसरों की नजरों में माल बन जाती होंगी।
आज भी देश के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं की दशा बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। अनेक गाँवों में शुष्क शौचालय न होने के कारण महिलाएं खेतों में ही निवृत होने जाने पर मजबूर हैं। देश में जिस तरह की सोच सालों साल तक बरकरार रही है,उसमें पुत्र को पुत्री से बेहतर माना जाता रहा है। एक आम अवधारणा है कि,बेटा ही कुल को आगे बढ़ाता है। इस तरह की अवधारणाओं से समाज को बाहर लाने की जरूरत है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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