गोष्ठी…
इंदौर (मप्र)।
सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ने के लिए लगन, अनुशासन, सहनशक्ति और एकाग्रता बेहद जरूरी है। पारिवारिक सहयोग से ही महिलाएं अपनी सेहत और लेखन को सहेज सकती हैं, क्योंकि खेल और लेखन दोनों ही विधाओं की चुनौतियों को लेखनी के माध्यम से ही सच्ची आवाज मिलती है।
यह बात कही मुख्य अतिथि प्रसिद्ध टेनिस खिलाड़ी स्निग्धा खासगीवाला ने। अवसर बना वामा साहित्य मंच द्वारा ‘खेल पर लेखन खेल नहीं…’ विषय पर अनूठी और विचारोत्तेजक मासिक गोष्ठी का। मंच की प्रचार प्रमुख सपना साहू ‘स्वप्निल’ के अनुसार इसका शुभारंभ डॉ. आराधना तिवारी द्वारा प्रस्तुत सुंदर वाग्देवी वंदना से हुआ। भावभूमि रखते हुए मंच की अध्यक्ष ज्योति जैन ने इस बात पर चिंता जताई कि आम तौर पर खिलाड़ी रहीं महिलाएं एक समय के बाद खेलों से विमुख हो जाती हैं और अपनी सेहत को नजरअंदाज करने लगती हैं; साथ ही उन्होंने लेखिकाओं को खेल जैसे अछूते विषयों पर भी सशक्तता से कलम चलाने के लिए प्रेरित किया। खिलाड़ी रह चुकी मंच से जुड़ी लेखिकाओं ने अपने खट्टे-मीठे संस्मरण व जीत-हार के अनुभव साझा किए। सुजाता देशपांडे, सुनीता दुबे ने ‘आंगन की मिट्टी से गुम होते खेल’, माधुरी निगम व सुनीता दुबे ने ‘ऐसा कोई प्रसंग जब मैं जीतकर हारी’ पर, तो शैला अज्बे ने ‘खेल सिर्फ अभ्यास नहीं एक अनुशासन है’ से प्रभावी विचार सबके बीच व्यक्त किए।
गोष्ठी की संयोजक अमर चड्ढा व अंजना चक्रपाणि मिश्र ने अतिथि स्वागत पुष्पगुच्छ व स्मृति चिन्ह भेंट कर किया। अंजना सक्सेना के जीवंत संचालन में हुई इस गोष्ठी के लिए प्रीति दुबे ने आभार व्यक्त किया।