बदलाव

विजयलक्ष्मी जांगिड़ ‘विजया’ 
जयपुर(राजस्थान)
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एक रास्ते पर दो पत्थर पड़े थे]बहुत दिनों तक पड़े रहे। एक दिन वहां एक मूर्तिकार आया]
उसके हाथ में छैनी-हथौड़ा था। दोनों पत्थरों ने उसे देखा और एक पत्थर छुप गया कि,ये मुझे ठोंकेगा- पीटेगाl मुझे दर्द होगा,मैं ऐसे ही ठीक हूँ।
दूसरे पत्थर ने उसे समझाया भी कि-`ये तुझे तराशकर तेरा रूप भी तो बदलेगा`,मगर वो नहीं माना और छुपा रहा। मूर्तिकार ने दूसरे पत्थर को उठा लिया और उसे मूर्ति बनाकर अपनी दुकान में सजा दिया। कुछ दिन बाद उसे एक सज्जन ने खरीदा और अपने मन्दिर में रखकर पूजा करने लगा।
कुछ दिन बाद उसी घर का एक बालक उस रास्ते से गुजरा और दूसरे पत्थर को उठा लाया खेलने के लिए।
उस घर में दोनों पत्थरों की जब नजरें मिली,तो दोनों को बेहद आश्चर्य हुआ। जो पत्थर छिप गया था, वह सकपका गया और उसे स्वयं की स्थिति पर ग्लानि हुई। उसने एक बात सीख ली कि,जो संघर्ष करता है,मेहनत करता है,वही मूर्ति बनकर पुजाता है,वरना पत्थर बनकर रास्ते पर पड़ा रहता है।
कुछ पाने के लिए खुद को बदलना जरूरी है,मेहनत करना जरूरी है।

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