सागर

विजयकान्त द्विवेदी
नई मुम्बई (महाराष्ट्र)

**********************************************

सागर त्वाम नमामि।
एक भाग है सूखी स्थली
और तीन भाग है पानी।
नदियाँ सारी तुझमें गिरती
है अनन्त काल से कहानी॥
सागर त्वाम नमामि!
उथल-पुथल अन्तर में तेरे
हे अगम्य जल राशी।
ज्वार और भाटा कहते
तेरे मन के हर्ष उदासी॥
पूर्ण चन्द्रमा देख है उठता
तेरे उर में उमंग हिल्लोरें।
और अमावस को उदास
क्यों भर आती दृग कोरें ?
हे नीले जल भरे समन्दर
हो अन्दर जलचर पाले।
मणि माणिक्य  मुक्तादिक
हैं भीतर भरे निराले॥
देव दनुज ले मंदराचल
मथ चौदह रत्न निकाले।
वारूणी विष अमृत निकले
किए वारूणी असुर हवाले॥
कालकूट पीकर शिव शम्भू
नीलकण्ठ कहलाए।
नाहक सुधा बू्न्द पी राहू
हरि से शीश कटाए॥
सिन्धु पराक्रम देख राम का
तुमने राह दिया था।
नल नील कपि भालू सैन्य
मिल निर्मित सेतु किया था॥
भारत श्री लंका के मध्य है
आज भी भग्न वह सेतु।
सिया हरण किया बर्बर रावण
हुआ युद्ध मुक्ति के हेतु॥
त्रेतायुग के बाद द्वापर में
द्वारिका श्री कृष्ण बसाए।
द्वारिकाधीश जब गए चले
तब तुम उसको अपनाए ?
सागर केवल जलराशि नहीं
हो जग में अमिट निशानी।
हे पारावार अपार उदधि
हे उद्दाम लहरों के स्वामी॥
सागर त्वाम नमामि।
सागर त्वाम नमामि॥
परिचय-मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि मोतिहारी चम्पारण (बिहार) है। आपने प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में प्राप्त की है। फिर स्नातक (बीए)बिहार से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान से सेवा के दौरान ही किया। श्री द्विवेदी का कार्यक्षेत्र भारतीय वायुसेना रहा है। आप वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई (महाराष्ट्र) स्थित खारघर में स्थाई निवासरत हैं। किशोरावस्था से ही कविता रचना में आपकी रुचि रही है, तथा हिन्दी में कविता एवं गीत लिखते हैं। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’(दिल्ली से १९८४) प्रकाशित हुआ है। रचनाएँ कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। आपको सम्मान के रुप में नई दिल्ली सहित अन्य प्रकाशन और संस्थाओं से साहित्य की सेवा के लिए सम्मान मिले हैं। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव रखने वाले श्री द्विवेदी की लेखनी का उद्देश्य-संस्कृत की तरह हिन्दी भी तिरोहित नहीं हो जाए,और अरबी ऊर्दू में नहाकर हिन्दी के नाम पर छा नहीं जाए,जो भारतीत संस्कृति पर धीमें जहर की तरह असरकारी होकर और अधिक हावी न हो। आप हिन्दी में साहित्य के पुरोधाओं .स्व.श्री मैथिलीशरण गुप्त,श्री दिनकर,श्री पन्त श्री निराला,श्री प्रसाद,श्री बच्चन और माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रव्यापी साहित्यिक वैचारिकता को प्रश्रयदेकर साहित्य को समृद्ध करने के पक्षधर हैं।

Hits: 19

आपकी प्रतिक्रिया दें.