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अभिनंदन करते तुमको

विजयलक्ष्मी जांगिड़ ‘विजया’ 
जयपुर(राजस्थान)
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अभिनन्दन करते तुमको,
चक्रव्यूह में खड़े अकेले।
हम वन्दन करते तुमको,
अभिमन्यु से लड़े अकेले।

भेद रावण की कलुषित लंका,
हनुमान तुम जय,अकेले।
अंगद से,जा भिड़े अडिग,
काल सम्मुख रहे,अकेले।

हिला नहीं पाया दुश्मन,
देश हित तन-मन जीवन।
धन्य तुम,माँ की आशा को,
पिता के तेज को धर आए।
शत्रु को नतमस्त अपनी,
मातृभूमि पर कर आए।
याद रहेगी ये अमिट कहानी,
इतिहास जयी तुम,नहीं अकेले।
कीर्ति गाथा दोहराएगी,
पीढ़ियाँ,तुमने गढ़ी,अकेले।

अभिनन्दन करते तुमको,
अभिमन्यु से लड़े अकेले।
हम वन्दन करते तुमको,
चक्रव्यूह में खड़े अकेले॥