Visitors Views 12

आत्मजा

विजयलक्ष्मी विभा 
इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश)
*********************************************************

‘आत्मजा’ खंडकाव्य से अध्याय-६
करती माँ आगाह सदा यों,
बेटी अब तू हुई सयानी
रखना फूँक-फूँक पग आगे,
नाजुक होती बहुत जवानी।
समझ न पाती माँ की बातें,
आगे कुछ भी पूछ न पाती
मुँह तक आता प्रश्न किन्तु वह,
लज्जा फिर आड़े आ जाती।
प्रश्न-प्रश्न ही रहे सदा से,
मिले न अब तक समुचित उत्तर
बचपन की जिज्ञासा भूली,
यौवन की हो चली प्रबलतर।
खुलते ही जाते हैं पन्ने,
जीवन की लम्बी पुस्तक के
पढ़ने स्वजन न देते अक्षर,
रखते मुझे सदा तक-तक के।
मुझे बुलाता ऊपर सूरज,
मुझे बुलातीं नीचे नदियाँ
लगता जैसे मिले बिना ही,
बीतीं उनसे अनगिन सदियाँ।
कभी बुलाता चंदा मुझको,
कभी बुलाते एवं तारे
बिछा हरित परिधान क्षितिज पर,
करते पर्वत सदा इशारे।
देते उपवन भी आमंत्रण,
बौर-बौर आती अमराई
फूल-फूल कचनार रिझाते,
मचल-मचल जाती पुरवाई।
झूम-झूम ललचाते प्रति पल,
शाखों पर पलास के गजरे
गुँथे प्रकृति के जूड़े में ज्यों,
कामिनी की बेणी से सँवरे।
कोयल कुहू-कुहू तान लगाती,
भनन-भनन अलि साज बजाते
रीझ-रीझ खिल जातीं कलियाँ,
खिले सुमन लुट-लुट पछताते।
जूही चौंक पूरती झर कर,
अमलताश की बजती पायल
त्रृतु बसन्त के शुभागमन पर,
होती अखिल भुवन में हलचल।
प्रकृति नटी के होते सारे,
मुझे लुभाने को आयोजन
एक-एक कर त्रृतुएँ आतीं,
एक-एक होते परिवर्तन।
ग्रीष्म दिखा कर अपनी ऊष्मा,
उड़ा-उड़ा देती मेरा मन
घर से बाहर उस कानन में,
मिलता शीतल जहाँ समीरण।
सूरज चुभा-चुभा कर सुइयाँ,
बना-बना देता तन छलनी
छन-छन श्वेद सुखाता मेरे,
धीरज की भी खिली कमलिनी।
कहता आतप निकल सदन से,
दूर कहीं जा बना सहेली
बैठी है क्यों यों एकाकी,
बूझे तेरी कौन पहेली।
सागर की लहरों-सी लहरा,
खेल वहाँ जा छप्पक छैंया
वहाँ मिलेगा तेरा बचपन,
खेल रहा होगा घमछैंयाँ।
खेल दिखाता नित प्रति नूतन,
पावस बजा-बजा कर डमरूl
भालू बादल नाचा करते,
बाँध इन्द्रधनुषी पग घुँघरूll
(प्रतीक्षा कीजिए अगले भाग की…)

परिचय-विजयलक्ष्मी खरे की जन्म तारीख २५ अगस्त १९४६ है।आपका नाता मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ से है। वर्तमान में निवास इलाहाबाद स्थित चकिया में है। एम.ए.(हिन्दी,अंग्रेजी,पुरातत्व) सहित बी.एड.भी आपने किया है। आप शिक्षा विभाग में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं। 
समाज सेवा के निमित्त परिवार एवं बाल कल्याण परियोजना (अजयगढ) में अध्यक्ष पद पर कार्यरत तथा जनपद पंचायत के समाज कल्याण विभाग की सक्रिय सदस्य रही हैं। उपनाम विभा है। लेखन में कविता,गीत,गजल,कहानी,लेख, उपन्यास,परिचर्चाएं एवं सभी प्रकार का सामयिक लेखन करती हैं।आपकी प्रकाशित पुस्तकों में-विजय गीतिका,बूंद-बूंद मन,अंखिया पानी-पानी (बहुचर्चित आध्यात्मिक 
पदों की)और जग में मेरे होने पर(कविता संग्रह)है। ऐसे ही अप्रकाशित में-विहग स्वन,चिंतन,तरंग तथा सीता के मूक प्रश्न सहित करीब १६ हैं। बात सम्मान की करें तो १९९१ में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘साहित्य श्री’ सम्मान,१९९२ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सम्मान,साहित्य सुरभि सम्मान,१९८४ में सारस्वत सम्मान सहित २००३ में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की जन्मतिथि पर सम्मान पत्र,२००४ में सारस्वत सम्मान और २०१२ में साहित्य सौरभ मानद उपाधि आदि शामिल हैं। इसी प्रकार पुरस्कार में काव्यकृति ‘जग में मेरे होने पर’ प्रथम पुरस्कार,भारत एक्सीलेंस अवार्ड एवं निबन्ध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त है। श्रीमती खरे लेखन क्षेत्र में कई संस्थाओं से सम्बद्ध हैं। देश के विभिन्न नगरों-महानगरों में कवि सम्मेलन एवं मुशायरों में भी काव्य पाठ करती हैं। विशेष में बारह वर्ष की अवस्था में रूसी भाई-बहनों के नाम दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कविता में इक पत्र लिखा था,जो मास्को से प्रकाशित अखबार में रूसी भाषा में अनुवादित कर प्रकाशित की गई थी। इसके प्रति उत्तर में दस हजार रूसी भाई-बहनों के पत्र, चित्र,उपहार और पुस्तकें प्राप्त हुई। विशेष उपलब्धि में आपके खाते में आध्यत्मिक पुस्तक ‘अंखिया पानी-पानी’ पर शोध कार्य होना है। ऐसे ही छात्रा नलिनी शर्मा ने डॉ. पद्मा सिंह के निर्देशन में विजयलक्ष्मी ‘विभा’ की इस पुस्तक के ‘प्रेम और दर्शन’ विषय पर एम.फिल किया है। आपने कुछ किताबों में सम्पादन का सहयोग भी किया है। आपकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है।