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आदिम युग की शुरुआत

डॉ.हेमलता तिवारी
भोपाल(मध्य प्रदेश)
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एक सुबह ६ अगस्त १९४५,
लिटिल बॉय ने
हिरोशिमा पर कहर ढाया था,
एक सुबह ९ अगस्त १९४५
फैट मैन ने,
नागासाकी को आग से नहलाया था
लाखों लोगों की राख से,
बिखर गए थे सपने
बचे हुओं को काली बारिश ने,
अपाहिज बनाया था।

आज भी विकिरण को,
बाकी लोग झेल रहे हैं
बरसों गुज़र गए फिर भी,
राहत की राह देख रहे हैं।

उस धरती पर बरसों बाद,
एक कोपल खिली
पत्तियां थिरकीं,
आसमान देख चहकीं।

बूढ़े कांपते हाथों ने मिट्टी से,
खींच कर उसे निकाला
छोटी-सी मूली को दाँतों से दबाया,
चरपरा तीखा स्वाद
मुँह में उतरता चला गया।

खुशी के आँसुओं ने झुर्रियों से भरे,
कपोलों को भिगो दिया
दो कांपते बूढ़े हाथ ऊपर वाले का,
शुक्रिया अदा कर रहे थे
साक्षात शिव भी जैसे धरती को,
सज़दा कर रहे थे।

आज फिर से शहरों का जलना जारी है,
तबाही का मंज़र तारी है
लोगों के हुजूम लाचार,बेहाल,
भूख,नींद और मौसम की मार
झेल रहे हैं,
मूक जानवरों की तक़लीफें उनके
लाचार चेहरे बयां कर रहे हैं,
कहाँ तो सुख का बिस्तर था!
कहाँ टेन्ट में जिन्दगी काट रहे हैं।

क्या फिर एटम बमों का क़हर बरपेगा,
फिर मानवता शर्मशार होगी
जमीन के टुकड़ों को लेकर,
जिन्दगी तार-तार होगी!

कौन किसको उँगली पकड़ कर चलाए,
यही झगड़े बाकी रह गए हैं
‘कोरोना’ ने हमारी क्षण भंगुरता बतला दी,
फिर भी संसाधनों पर मर रहे हैं।

द्वीपों-क़बीलों में दुनिया बंट जाना है,
रहना सब अपने टापुओं पर
आदिम युग में चले जाना है,
ढूंढना फिर कोई कोपल
चरपरी मूली का तीखा-सा स्वाद,
कहीं कोई छोटा-सा पौधा
कहीं खिली थोड़ी-सी घास,
खाने की भीषण किल्लत
सोने के लिए एक आसरा,
लॉकरों में रखा सोना
म्युचूअल फंड में रखा पैसा,
अधूरी रह जाएगी कैसी-कैसी आस।

सुबह की भागदौड़,शाम की थकन,
चाय की चुस्की,घर वालों की झिड़की
बचे रहे तो मिलेंगे,वरना सपने सिर्फ,
खुली आँखों में सिमट कर रह जाएंगे।

शिव का तांडव,
धरती का विलाप
अभी बाकी है,
एक बार फिर सोच लो
हाहाकार करती,करवट बदलती धरती,
समुंदर में तैरते टापूओं की दुनिया
में बदल जाएगी,
फिर लम्बे रास्तों में
जंगल के उंचे पेड़ों के बीच,
गुज़रने के रोमांच की चाह
टीस बनकर ही रह जाएगी।

सम्हल जाओ संप्रभुता की चाह लिए लोगों,
सबको अपनी आज़ादी में जीने दो
प्यार,मुहब्बत,नेह की बातें करो,
दोस्ती,वफ़ा,यारी की बाँहें पसारो।

अभी भी वक़्त है गले मिल जाओ,
इस खूबसूरत दुनिया को
भीषण तबाही से बचाओ।
इस खूबसूरत दुनिया को,
भीषण तबाही से बचाओ॥

परिचय-डॉ.हेमलता तिवारी का जन्म १४ नवम्बर १९६५ को सागर में हुआ हैL वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निवास है,जबकि स्थायी पता भोपाल(मध्य प्रदेश) हैL बी.एस-सी,(जीवविज्ञान)बी.ए.(संगीत), एम.ए (संगीत, इतिहास, दर्शन,लोक प्रशासन,एजूकेशनल सायकोलॉजी, क्लीनिकल साय.,आर्गेनाइजेशनल साय.)एल.एल.बी.,पी.जी.डी.(लेबर लॉ एंड इण्डस्ट्रियल रिलेशन)सहित पी.एच-डी.(इन क्लीनिकल साय.), एम.बी.ए.(वित्त और मानव संसाधन) की शिक्षा प्राप्त डॉ.तिवारी का कार्य क्षेत्र-नौकरी हैL सामाजिक गतिविधि के तहत आप व्यक्तित्व विकास प्रशिक्षक,परामर्शी सहित ज्योतिष लेखन में सक्रिय हैंL इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी एवं आलेख हैL हिन्दी सहित अंग्रेजी का भाषा ज्ञान रखती हैं।

 

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