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उल्टा दांव

डॉ.शैल चन्द्रा
धमतरी(छत्तीसगढ़)
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“हमारे घर ऐसा होता है,हमारे घर वैसा होता है।” यही जुमला सुन-सुन कर रेखा के कान पक चुके थे। अभी लग्न लेकर लड़के वाले रेखा के घर आये हुए थे। सगाई की तारीख तय हो गई थी। लड़के की माता जी रेखा के घर इस बीच दो-चार बार आ चुकीं थीं और जब भी आतीं हर बार यही जुमला बोलती,-“हमारे घर ऐसा होता है,हमारे घर वैसा होता है।”
पता नहीं क्यों,आज इक्कीसवीं सदी में भी लोग उन्हीं घिसी-पिटी परम्पराओं को निभाने के लिए मजबूर करते हैं,जिनका कोई औचित्य नहीं है…यह रेखा मन ही मन सोचती।
आज रेखा की होने वाली सास प्रभादेवी उसके पिता से कह रहीं थीं-“देखो भाई साहब,हमारे यहां सगाई में पूरे सात मन लड्डू देने का रिवाज है,पर कोई नहीं आप एक सौ एक लड्डू बड़े साइज का एक लड्डू लगभग पांच-पांच किलो के भेज दीजियेगा,और हाँ सारे लड्डूओं के अंदर चांदी का सिक्का जरूर भरवा दीजियेगा। हमारे घर ऐसा ही होता है। हाँ जी,सगाई में सात प्रकार के फल मिठाई और अनाज देना भी जरुरी है। हमारे यहां सात-सात मन ये सब चीज देने का रिवाज है। रही बात कपड़े-गहने की,तो वे आप लोग हमारे पूरे परिवार को सात-सात जोड़े देंगे ही। हमारे घर ऐसा ही होता है।”
यह सुनकर रेखा के धैर्य का बांध टूट गया। उसने जरा रोष भरे स्वर से कहा,-“मांजी,पर हमारे घर पर ऐसा नहीं होता है। हमारे घर पर ये सारी चीजें केवल सात किलो तक अब तक दी जाती रही हैं। बड़ी दीदी को ऐसा ही दिया गया था। वैसे आपके घर जैसे होता है,वैसे हर घर में हो यह जरुरी नहीं है। मुझे माफ़ कर दीजियेगा मांजी,आज के इस महंगाई के युग में सात-सात मन फल मिठाई और अनाज तो कोई राजा-महाराजा ही दे सकता है। इस तरह की बेतुकी मांग जब लड़के वाले करते हैं,तो लड़की पक्ष के लोग सौजन्यतावश पूरी भी करते हैं,पर उनकी कितनी मज़बूरी होती है,यह आप लोग क्या जानें ? बुरा न मानें तो एक बात और कहना चाहूंगी। अभी आपकी बेटी पूजा भी शादी लायक है। अगर यही जुमला पूजा के ससुराल वाले कहें और बेतुकी मांगों को पूरा करने को कहें,तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी ? क्या हुआ हम लड़की वाले हैं तो ? अब लड़की कोई मोम की गुड़िया नहीं है,कि जो चाहे नचा लें। हमारी भी इच्छा और अनिच्छा है। पिताजी मुझे क्षमा करें,मुझे यह शादी मंजूर नहीं,जहाँ मुझे अपनी मर्जी से जीने,कुछ करने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी।”
रेखा की यह बात सुनकर लड़के की माँ प्रभादेवी पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया।

परिचय-डॉ.शैल चन्द्रा का जन्म १९६६ में ९ अक्टूम्बर को हुआ है। आपका निवास रावण भाठा नगरी(जिला-धमतरी, छतीसगढ़)में है। शिक्षा-एम.ए.,बी.एड., एम.फिल. एवं पी-एच.डी.(हिंदी) है।बड़ी उपलब्धि अब तक ५ किताबें प्रकाशित होना है। विभिन्न कहानी-काव्य संग्रह सहित राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में डॉ.चंद्रा की लघुकथा,कहानी व कविता का निरंतर प्रकाशन हुआ है। सम्मान एवं पुरस्कार में आपको लघु कथा संग्रह ‘विडम्बना’ तथा ‘घर और घोंसला’ के लिए कादम्बरी सम्मान मिला है तो राष्ट्रीय स्तर की लघुकथा प्रतियोगिता में सर्व प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त किया है।सम्प्रति से आप प्राचार्य (शासकीय शाला,जिला धमतरी) पद पर कार्यरत हैं।