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खत्म करो वो धाराएँ…

मालती मिश्रा ‘मयंती’
दिल्ली
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समय की धारा हर पल बहती मानव के अनुकूल,
तीन सौ सत्तर कैसी धारा’ बहे सदा प्रतिकूल।
जो है निरर्थक नहीं देशहित पैदा करे दुराव,
खत्म करो वो धाराएँ जो नहीं राष्ट्र अनुकूल॥

व्याधियों से लड़ते-लड़ते बीते सत्तर साल,
बनकर दीमक चाट रहे जो वही बजाते गाल।
जुबां खोलने से पहले वो सोचें सौ-सौ बार,
घर के जयचंदों का घर में कर दो ऐसा हाल॥

सत्ता पाने के लालच में हुए शत्रु के मीत,
भेड़ खाल में छिपे भेड़िए नाहर से भयभीत।
घर में बैठे जयचंदों का हो पहले संहार,
तभी सुनिश्चित हो पाएगी अरि पर अपनी जीत॥

धाराओं की आड़ में ये बेल विषैली रोप रहे,
अपनी कुत्सित मंशाओं को जनता पर थोप रहे।
पाक प्रेम में लिप्त जयचंदों को भेजो उस पार,
भाई कहकर ये भाई के पीठ में खंजर घोंप रहे॥

परिचय-मालती मिश्रा का साहित्यिक उपनाम ‘मयंती’ है। ३० अक्टूबर १९७७ को उत्तर प्रदेश केसंत कबीर नगर में जन्मीं हैं। वर्तमान में दिल्ली में बसी हुई हैं। मालती मिश्रा की शिक्षा-स्नातकोत्तर (हिन्दी)और कार्यक्षेत्र-अध्यापन का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप साहित्य सेवा में सक्रिय हैं तो लेखन विधा-काव्य(छंदमुक्त, छंदाधारित),कहानी और लेख है।भाषा ज्ञान-हिन्दी तथा अंग्रेजी का है। २ एकल पुस्तकें-अन्तर्ध्वनि (काव्य संग्रह) और इंतजार (कहानी संग्रह) प्रकाशित है तो ३ साझा संग्रह में भी रचना है। कई पत्र-पत्रिकाओं में काव्य व लेख प्रकाशित होते रहते हैं। ब्लॉग पर भी लिखते हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा,हिन्दी भाषा का प्रसार तथा नारी जागरूकता है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-अन्तर्मन से स्वतः प्रेरित होना है।विशेषज्ञता-कहानी लेखन में है तो रुचि-पठन-पाठन में है।