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फ्रांस-भारत की दोस्ती से दुनिया की बेहतरी

ललित गर्ग
दिल्ली
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भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राएं नए भारत-सशक्त भारत की इबारत लिखने के अमिट आलेख हैं। उनके नेतृत्व में उभरता नया भारत विकसित एवं विकासशील देशों के बीच सेतु बन रहा है। हाल ही में अमेरिका एवं मिस्र की ऐतिहासिक एवं सफल यात्राओं के बाद मोदी फ्रांस की यात्रा पर हैं। इस वर्ष भारत और फ्रांस के बीच राजनीतिक साझेदारी के २५ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं और दौरा काफी अहम है। पिछले २५ वर्षों में दोनों देशों के बीच कई द्विपक्षीय समझौते हुए, लेकिन इस बार होने वाले समझौतों से दोस्ती का नया दौर शुरू होगा। भारत की विदेशों में बढ़ती साख को इस यात्रा से एक नई ऊंचाई मिलेगी। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया। श्री मोदी बैस्टिल दिवस परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। फ्रांस की इस यात्रा के दौरान होने वाले विभिन्न समझौते भारत की रक्षा, प्रौद्योगिकी, तकनीकी एवं सामरिक जरूरतों को पूरा करने में अहम कदम साबित होंगे। व्यापार व उद्योग के साथ-साथ प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में फ्रांस के साथ द्विपक्षीय सहयोग से नई उम्मीदें जागेगी। इस यात्रा के दौरान किए गए प्रधानमंत्री के प्रयास मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भरता एवं सतत विकास की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होंगे।
फ्रांस एक ऐसा देश है जो हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है। भारतीय सेना को मजबूत करनेे की बात हो या फिर परमाणु परीक्षण का दौर, वह भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा दिखाई देता रहा है। वर्ष १९९८ में जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण से पूरी दुनिया को चौंका दिया था और उस समय डरी एवं सहमी शक्तियों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे, तब फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति जैक शिराक ने भारत का साथ दिया और कहा था कि हमें एशिया की उभरती हुई महाशक्ति को नजरंदाज नहीं करना चाहिए। आज भी एक मित्र की भांति फ्रांस भारत के साथ खड़ा है। फ्रांस द्वारा भारत को इतना सम्मान एवं महत्व देने के पीछे कई कारण हैं। इनमें भारत की बड़ी होती अर्थव्यवस्था और बड़ा बाजार प्रमुख है। भारत की शांति एवं सद्भाव की नीति है। दुनिया की महाशक्तियों से संतुलन बनाने में भारत उसका मुख्य आधार है। भले ही भारत फ्रांस से सैन्य सामग्री खरीदने वाला प्रमुख देश है। इन दिनों रूस और चीन काफी नजदीक आए हैं। रूस के नए विकल्प के तौर पर फ्रांस से बेहतर कोई और देश नहीं हो सकता है, जो रक्षा सहयोग तो करता ही है साथ ही तकनीक में भी सहयोग कर रहा है। भारत के लिए रूस की जो जगह है, वह स्थान फ्रांस को देने के लिए भारत को सोचना चाहिए, भारत ऐसा ही सोचेगा यह फ्रांस को अहसास है। यह अहसास भी दोनों देशों की मित्रता को प्रगाढ़ करने का बड़ा आधार है। यही कारण है कि फ्रांस और भारत के संबंधों को कई पहलुओं और कई नजरियों से आंका जा रहा है। इतिहास में देखें तो दोनों देशों का आपस में जो तालमेल है, वो २ सभ्यताओं का हो सकता है, २ विचारधाराओं एवं संस्कृतियों का हो सकता है।
भारत भी ऐसे देश से दोस्ती बढ़ाना चाहेगा, जो उसके विकास एवं मजबूती का आधार हो। फ्रांस भारत की शांति का पक्षधर रहा है, इसलिए विश्वस्तर पर भारत में पड़ोसी देश द्वारा पल्लवित आतंकवादी घटनाओं का विरोध करता रहा है। अब तो यह भी लगने लगा है कि, फ्रांस ने पश्चिमी दुनिया में भारत के विश्वस्त दोस्त और सहयोगी साझेदार के रूप में रूस की जगह ले ली है। भारत ने फ्रांस का तब से विशेष सम्मान करना शुरू कर दिया है, जब फ्रांस ने संयुक्त राष्ट्र में चीन द्वारा कश्मीर पर बुलाई गई बैठक में भारत के रूख का समर्थन किया था। फ्रांसीसियों ने पहले भी वैश्विक आतंकवादी मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन किया था।
फ्रांस न केवल भारत में आतंकवाद को समाप्त करने में सहयोगी बन रहा है, बल्कि भारत को एक शक्तिसम्पन्न देश बनाने में भी हरसंभव सहयोग कर रहा है। फ्रांस से हमारी सैन्य शक्ति मजबूत हुई है, वहां से हमें लड़ाकू विमान से लेकर पनडुब्बी तक मिल रही है। इस यात्रा के दौरान दोनों देश महत्वपूर्ण रक्षा और व्यापारिक समझौते पर मुहर लगाएंगे। दुनिया की एक बड़ी ताकत बनते भारत को फ्रांस की मित्रता से अनेक लाभ हैं। भले ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में पिछले कुछ सालों में भारत ने दूरगामी प्रभाव वाले कदम उठाए हैं, जिसकी बदौलत हमारे रक्षा आयात में कुछ कमी जरूर आई है। इसके बावजूद भी ये सच्चाई है कि, रक्षा जरूरतों को पूरा करने में बाहरी मुल्कों और विशेषतः फ्रांस पर निर्भरता को पूरी तरह से खत्म करने में भारत को अभी लंबा सफर तय करना पड़ेगा। यह बात फ्रांस भली-भांति जानता है। इसी लिए भारत के इस रक्षा बाजार पर अमेरिका के साथ ही फ्रांस की भी नजर है।
प्रधानमंत्री की यह यात्रा दुनिया की गैर-जिम्मेदार बढ़ी शक्तियों की दादागिरी को समाप्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। भारत दुनिया में ऐसे राष्ट्रों को संगठित करना चाहता है जो युद्ध विरोधी हों। इसी उद्देश्य से भारत, फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ओमान की खाड़ी में अपना पहला त्रिपक्षीय समुद्री अभ्यास सफलतापूर्वक किया। युद्ध चाहने वाले देशों के लिए अपनी सोच बदलने को विवश करना ऐसे संगठनों एवं साझे प्रयत्नों से ही संभव होगा। नरेन्द्र मोदी के फ्रांस दौरे पर दुनिया की नजरें लगी हुई हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रभावशाली सदस्य है और उसने अमेरिका की तरह भारत से कभी भी विशुद्ध सौदेबाजी नहीं की। चीन की बढ़ती आक्रामकता एवं विस्तारवादी सोच को रोकने के लिए अमेरीका एवं फ्रांस दोनों देश भारत के बहुत करीब आए हैं। दोनों देशों के भारत प्रशांत क्षेत्र में साझा हित और सौर ऊर्जा तकनीक के प्रसार की संभावनाएं है। युद्ध, हिंसा, साम्प्रदायिक उन्माद एवं आतंकवाद को पोषित करने वाले चीन एवं पाकिस्तान को सबक सिखाना दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत हो गई है। ऐसा करना इसलिए आवश्यक हो गया है, क्योंकि पाकिस्तान जहां आतंकवाद को सहयोग-समर्थन और संरक्षण देने से बाज नहीं आ रहा है, वहीं चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के चलते एशिया ही नहीं, पूरे विश्व के लिए खतरा है। मानकर चलिए कि मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के बीच होने वाली वार्ताओं से व्यापार से लेकर ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी, रक्षा और सुरक्षा सहयोग और भारत-प्रशांत में सहयोग जैसे मुद्दों पर ऐसा सकारात्मक वातावरण बनेगा, जिससे समूची दुनिया शांति, सहयोग एवं आतंकवाद मुक्ति का अहसास कर सकेगी।

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